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आचार्य भारीमालजी
2 / 11 · आचार्य

आचार्य भारीमालजी

1803-1821

Life events

आचार्य-काल
1803–1821

Life

जन्म
मुहां ग्राम (राजस्थान)सं. 1804
पिता
किशनोजी लोढ़ा
माता
धारिणी
द्रव्य दीक्षा
बागोर (राजस्थान)सं. 1813
भाव दीक्षा
केलवा (राजस्थान), आषाढ़ पूर्णिमासं. 1817
युवाचार्य पद
बिठौड़ा (राजस्थान), मार्गशीर्ष कृष्णा 7सं. 1832
आचार्य पद
सिरियारी, भाद्रपद शुक्ला 13सं. 1860
देवलोकगमन
राजनगर, माघ कृष्णा 8सं. 1878

Chaturmas · 18

  1. 1861 · 1804Pisangan
  2. 1862 · 1805Pali
  3. 1863 · 1806Kherwa
  4. 1864 · 1807Kelwa
  5. 1865 · 1808Nathdwara
  6. 1866 · 1809Amet
  7. 1867 · 1810Balotara
  8. 1868 · 1811Pali
  9. 1869 · 1812Jaipur
  10. 1870 · 1813Madhopur
  11. 1871 · 1814Borawar
  12. 1872 · 1815Siriyari
  13. 1873 · 1816Pali
  14. 1874 · 1817Nathdwara
  15. 1875 · 1818Kankroli
  16. 1876 · 1819Pur
  17. 1877 · 1820Nathdwara
  18. 1878 · 1821Kelwa

आचार्य श्री भारीमालजी तेरापंथ के द्वितीय आचार्य थे। उनका जन्म विक्रम संवत् 1803 में मेवाड़ के मुहाम गाँव में हुआ। वे ओसवालों के लोढ़ा परिवार से थे।

उनके पिता का नाम किशनोजी और माता का नाम धारिणी था। दस वर्ष की अवस्था में स्वामीजी ने उन्हें दीक्षित किया। वे सरल, स्पष्टवादी और विनम्र स्वभाव के थे, और सदा सत्य के पक्ष में रहे।

मतभेद के कारण जब आचार्य भिक्षु ने स्थानकवासी परम्परा से अपना मार्ग अलग किया, तब वे भी उनके साथ रहे। मुनि भारीमालजी अत्यन्त परिश्रमी, दृढ़ और उच्च कोटि के विद्वान् साधु थे। उन्होंने हजारों श्लोक कण्ठस्थ कर अपनी असाधारण क्षमता का परिचय दिया।

शास्त्रों के अध्ययन में उनकी गहरी रुचि थी। प्रायः वे रात्रि के एक प्रहर में खड़े-खड़े उत्तराध्ययन सूत्र की दो हजार गाथाओं का स्मरण कर लेते थे। लिपि-कला में वे अत्यन्त निपुण थे।

स्वामीजी द्वारा लिखे गए प्रायः सभी शास्त्र उन्होंने पुनः लिखे, और उनकी ये प्रतियाँ आज भी स्वामीजी की प्रामाणिक कृतियाँ मानी जाती हैं। स्वामीजी जो भी उपदेश देते — निबन्ध, लेख अथवा नए विधान के रूप में — वे उसे संकलित करते जाते। उन्होंने अपने जीवनकाल में लगभग पाँच लाख पद्यों की रचना की; तेरापंथ में सम्भवतः इतना लेखन किसी ने नहीं किया।

स्वामीजी प्रत्येक नई आचार-संहिता सबसे पहले आचार्य भारीमालजी पर लागू करते थे, जिससे शेष सभी साधु सहजता से उनका अनुसरण कर लेते। एक बार उनकी परीक्षा लेते हुए स्वामीजी ने कहा — "यदि कोई तुम्हारा दोष निकाले तो तुम्हें तीन दिन का उपवास करना होगा।" भारीमालजी ने पूछा — "यह तप मुझे दोष सत्य होने पर करना है, या तब भी जब कोई मिथ्या आरोप लगाए?" स्वामीजी ने कहा — "दोनों ही स्थितियों में। चाहे वह भूल का प्रायश्चित्त हो, चाहे कर्मों के उदय का।" भारीमालजी ने यह वचन सहर्ष स्वीकार किया।

वे प्रत्येक आचार-नियम के प्रति सजग रहे, और अपने सम्पूर्ण जीवन में किसी को अपनी कोई त्रुटि बताने का अवसर नहीं दिया। विक्रम संवत् 1832 में वे युवाचार्य बने और संवत् 1860 की भाद्रपद शुक्ला त्रयोदशी को आचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए। वे अत्यन्त साहसी थे और हर स्थिति में स्थिरता बनाए रखते थे।

एक बार कुछ विरोधियों ने उदयपुर के तत्कालीन शासक से कहा कि भारीमालजी की उपस्थिति अनिष्टकारी है, अतः उन्हें चातुर्मास यहाँ न करने दिया जाए। शासक ने यह मान लिया और उन्हें नगर छोड़ने का आदेश दिया। साधु-मर्यादा का पालन करते हुए वे उदयपुर से राजनगर चले गए।

वहाँ के निवासी श्री केसरीजी भंडारी ने उपयुक्त अवसर देखकर शासक से कहा — "महाराज, आपने हमारे नगर से ऐसे सन्त को निकाल दिया जो चींटी तक को मारना नहीं चाहते। स्मरण रखिए, सन्तों को कष्ट देने वाले को प्रकृति क्षमा नहीं करती।" शासक ने इस पर विचार किया और अपनी भूल पर पश्चात्ताप करते हुए भारीमालजी को पत्र लिखकर लौटने की प्रार्थना की। वृद्धावस्था के कारण वे स्वयं नहीं लौटे; दूसरी बार प्रार्थना आने पर उन्होंने मुनि हेमराजजी, रायचन्दजी और जीतमलजी सहित तेरह सन्तों को उदयपुर भेजा।

उनके आचार्यकाल में अड़तीस पुरुषों और चवालीस महिलाओं ने दीक्षा ली। विक्रम संवत् 1878 की माघ कृष्णा अष्टमी को, छह प्रहर का सागारी अनशन और तीन प्रहर का चौविहार करके, उनका देहावसान हुआ।