Bhaktamar
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- 1स्वीकारों सविनय भाव-वन्दना तीर्थकर भगवान।
- 2सुजनो! क्षमा धर्म का सार तत्त्व है, क्षमा शील बन रहना।
- 3ओ जयवन्तो शासण आपां रो, जयवन्ता गण-माली।
- 4म्हे तेरापंथ तपोवन में आनन्द अलौकिक पावां,
- 5हो देखो, तपसणजी रै आंगणै दीवाली आई है।
- 6फूल खिल्या ज्यूं बागां में, रंग भर्यो ज्यूं रागां में,
- 7धर्म रै बागां में सुन्दर फूल खिलसी।
- 8देखे पावस में तप साधना री रौनक लागी रे,
- 9म्हे तो देवां हो बधायां थानै घणी रे घणी
- 10अनोखी तप री जोत जलाई जी,
- 11ओ दीपै संधारो, ओ संथारो समता स्यूं रे, क—
- 12आत्म-शुद्धि का अनशन, शुभ सोपान है,
- 13जीवन सुखी बने कैसे?
- 14भिक्षु शासन रो बगीचो बारहमास गुलजार,
- 15कार्यकर्ता बन्धुओं का जीवन हो अवदात,
- 16जाग उठो अब युवा बन्धुओ! वक्त नहीं है सोने का।
- 17विपदाओं से मत घबराओ, अपने साहस से आगे बढ़े जाओ।
- 18ओ युवा रे! सीधी राहों पे क्या चलना?
- 19अपना करो सुधार-३
- 20व्यसन और फैशन दोनों, पतन की निशानी हैं।
- 21जिन्दगी यह खेल का मैदान है,
- 22नयी सदी की अगवानी में, करो नया निर्माण,
- 23जनम जनम के क्लेश मिटाए, वीतराग विज्ञान।
- 24जागो बहनो! नव प्रभात यह जागृति का आह्वान करें।
- 25आओ प्रगटावां आपां जागरण रो दिवलो,
- 26आभारी नारी का इन्सान,
- 27युवती बहनो! अब आगे आओ।
- 28सोचें विचारें कन्याएं कैसे जीवन के दर्पण को चमकाएं।
- 29अच्छे मानव हों तैयार, विद्यालय से पा संस्कार। '
- 30ऊंचा लक्ष्य बनाया
- 31बच्चो! हो जाओ तुम, अब जल्दी से तैयार।
- 32रक्षा बन्धन का यह पावन पर्व प्रेरणा लाया है,
- 33रंगों का त्योहार, सुरंग जीवन बन जाए।
- 34सद्गुण के मोती बोने का आया अवसर है,
- 35दीपोत्सव का है उज्ज्वल इतिहास, जागे चेतना।
- 36जन-जन का कल्याण करती, ।
- 37क्यों बाहर-बाहर घूम रहा तू, अपने घर में रम।
- 38संयम की शक्ति जगाएं,
- 39सत्य की महिमा अपरम्पार।
- 40झूठी है जग की माया, क्यों तू इसमें भरमाया,
- 41आत्मजयी उन ऋषि-मुनियों को, शत-शत नमन हमारा,
- 42जप नवकार, जप नवकार, महामन्त्र जपलै नवकार।
- 43विश्व-मैत्री के स्वरों में, प्राण भरना है।
- 44मानव मन की ईर्ष्या वह लाचारी है।
- 45गुण अनुराग जगाएं,
- 46तू समता सुधारस पी ले, जिन्दगी में विष भी मिलता है।
- 47हम सहज समाधि में रम जाएं,
- 48चेतन! चित्त निरमल बणालै, थारा दुखड़ा सै मिट ज्यासी रे।
- 49करु सदा अन्यत्व अनुप्रेक्षा का मैं अभ्यास।
- 50क्षण भंगुर यह जीवन है, बहते जल-सा यौवन है।
- 51बन्दे! ज्ञान पंचामृत की ले ले गुटकी,
- 52सूरज उगियो, शिखरां चढ़ियो, कोई समकित किरणां बिखरी हो आज।
- 53जैन श्रमण की कठिन साधना, पा सकते थाह नहीं।
- 54जैन श्रमण की दीक्षा लेने, वैरागी तैयार।
- 55तपस्या है उत्तम मंगल।
- 56साधना के शुद्ध पथ पर, चरण ये गतिमान हों अब।
- 57जैन-जगत का पर्व महान्,
- 58लाया धर्म का उजास पर्व पर्यूषण।
- 59धर्म रम्यो जाणै रग-रग में, हुयो च्यानणो मन-मग में,
- 60आजा रे, आजा रे, ओ मेरे मनवा! आजा,