गीतिका संग्रह — पृष्ठ 8
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- उड़ान-हे देव! तुम इस भक्त की सुन लो अरदास को,
- उड़ान—
- उड़ान—
- उड़ान—
- उडा़न—
- उड़ान—ॐ भिक्षु जपें, जय भिक्षु जपें,
- उतरो चिन्मय चरण, ले लो अपनी शरण,
- उत्तम श्रावक
- उत्सव आया है।
- उन्नति का सूत्र सुझा गये
- उपकार
- उमडै जनता रौ सैलाब, दिन-दिन बढ़े संघ री आब,
- उमरियां बीती जावै रे,
- उमरियां सारी रे सारी,
- उम्र
- उस पार
- उस महापुरुष को नमस्कार
- ऊँ जय दीपांनन्दन
- ऊँ भिक्षु-जय भिक्षु रटन लागावां
- ऊंचा उठाओ तुम, हो अपने भाव को,
- ऊगा स्वर्णिम दिन आज, हम मंगल गाएं ।
- ऊग्यो भानूड़ो, सोने-चांदी रो बालू आंगणै।
- ऊग्यो स्वर्णिम भान है, दर्शन पा पुलकित प्राण है।
- ऋतम्भरा प्रज्ञा के स्वामी
- ऋषभ की बलिहारी
- ऋषभ पारणा
- ऋषि-मुनियों ने सिखलाया था
- ए..... किण पर इतरावै,
- एक दमड़ी
- एक पक्ष पर अड़ मत जाना।
- एक प्रश्न
- एक बार आओ म्हारा सांवरिया स्वामीजी
- एक माला
- एक र अठै पधारो स्वामी, वाट जो रह्या थांरी
- एक ही वह नाम तुलसी
- एक ही व्यापक अहिंसा
- एकत्व
- ऐ सुज्ञ साधुओ! दृढ़ संकल्प सजाएं,
- ऐसा जीवन बना, मन को पावन बना, सच्चा सुख जो मिले,
- ऐसा दीप जलायें
- ऐसी दुनिया से हमको प्यार,
- ओ इन्सान! ओ इन्सान!
- ओ उजियारो च्यार दिना रो फेर अंधेरो हो ज्यासी,
- ओ खिण ओ खिण बीती जावै, भोला भाइड़ा।
- ओ गण के सितारे
- ओ गुरुजी! विनतड़ी अवधारो,
- ओ गुरुवर !वन्दन लो शत वार,
- ओ गुरूवर आपरो उपकार
- ओ जरा कर ले प्रभु से तूं प्यार,
- ओ जिनशासन दीप, भवोदधि द्वीप, भक्तियुत नमन करां,
- ओ तपस्या रो रंग
- ओ तो लाडांजी रो वीरो, माता वदना रो लाल,
- ओ दीपां नंदन
- ओ धर्म सढा मंगलकारी
- ओ नरभव पायो अनमोल, इण नै कोड्यां स्यूं मत तोल
- ओ प्रभुवर! भीति भगा दो,
- ५७, ओ बंधु रे
- ओ भव रत्न चिंतामणि सरिखो
- ओ भाग दौड़ में ही नर जीवन व्यर्थ गमावै रे,
- ओ भिक्षुरज! शत-शत प्रणाम