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Mantra

The core mantras of the Jain faith — the recitations of the Pancha-Parameshthi, mangal and sharan.

नमस्कार महामंत्र (णमोकार मंत्र)

णमो अरिहंताणं । णमो सिद्धाणं । णमो आयरियाणं । णमो उवज्झायाणं । णमो लोए सव्वसाहूणं । एसो पंच णमोक्कारो, सव्वपावप्पणासणो । मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं ॥

जैन धर्म का सर्वोपरि एवं शाश्वत महामंत्र — अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय एवं समस्त साधुओं को नमस्कार। यह पंच-परमेष्ठी को समर्पित है।

चत्तारि मंगलं

चत्तारि मंगलं — अरहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं, केवलिपन्नत्तो धम्मो मंगलं । चत्तारि लोगुत्तमा — अरहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलिपन्नत्तो धम्मो लोगुत्तमो । चत्तारि सरणं पवज्जामि — अरहंते सरणं पवज्जामि, सिद्धे सरणं पवज्जामि, साहू सरणं पवज्जामि, केवलिपन्नत्तं धम्मं सरणं पवज्जामि ॥

चार मंगल, चार लोकोत्तम एवं चार शरण का पाठ — अरिहंत, सिद्ध, साधु एवं केवली-प्रज्ञप्त धर्म ही मंगल, उत्तम एवं शरण हैं।

उवसग्गहरं मंत्र

उवसग्गहरं पासं, पासं वंदामि कम्मघणमुक्कं । विसहर-विसनिन्नासं, मंगल-कल्लाण-आवासं ॥

भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित उपसर्ग-हरण मंत्र — विघ्न, विष एवं कष्टों के निवारण हेतु परंपरागत रूप से जपा जाता है।

लोगस्स (नाम-स्तव) मंगल

लोगस्स उज्जोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे । अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली ॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा । सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥

चौबीस तीर्थंकरों की स्तुति का आदि एवं अंतिम अंश — नाम-स्तव के रूप में नित्य पाठ्य।