गीतिका संग्रह — पृष्ठ 9
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- ओ भिक्षुराज! अनुशासन की इस युग को देन तुम्हारी है,
- ओ भैक्षव गण अधिनायक
- ओ मन के पंछी रे,
- ओ मन हंसा बावला मत इत उत भटका खा,
- ओ मनड़ो सरसै जी...
- ओ महावीर! ओ महावीर! दिखलादो भवसागर तीर
- ओ मेरे गुरुदेव !
- ओ मेरे तुलसी स्वाम
- ओ म्हारा गुरुदेव!
- ओ म्हारै खुशियां रो नहीं पार, युवाचार्य पाया।
- ओ रे खेवैया! पार लगा दे तूं नैया,
- ओ लगी पांख सी संत-सत्यांरै दोड्या आवैरे,
- ओ लागै आलीशान
- ओ लागै प्राणां स्यूं भी प्यारो, जन-जन री आख्यां रो तारो,
- ओ विराट व्यक्तित्व!
- ओ वीर प्रवर
- ओ संघ के सितारे, दीपां के लाल प्यारे,
- ओ सांवरा, ओ सांवरा,
- ओ सांवरिया स्वाम
- ओ सिरियारी के संत!
- ओ स्वामीजी रो नाम सदा म्हारै मन भायो है,
- ओ! दूर के मुसाफिर! मंजिल न भूल जाना रे,
- ओ! श्वेत संघ के सबल सैनिको! अपना फर्ज बजाना है।
- ओच्छव आयो रै!
- ओछी तो ऊमर जिण में
- ओम् अर्हं, ओम् अर्हं, जपो प्यारे ओम् अर्हं,
- ओम् ओम् ओम् भिक्षु की जय बोलो,
- ओम् भिक्षु जय तुलसी मंत्र सदा बोलो,
- ओम् भिक्षु जय भिक्षु, श्वास श्वास गाता है।
- औरों का जो करता आदर,
- औरों की चिन्ता को छोड़ के दे तूं निज पर ध्यान,
- कंटालिय जन्मोत्सव साझ, सुधरी में की सिंहोगाज,
- कच्चे रिश्ते कच्चे नाते
- कड़वो बोल्यां अनरथ हुवै
- कद आ नाव तिरावोला
- कद बो शुभ दिन आसी रे, बणस्यूं शिवपदवासी रे,
- कन्याओं की शक्ति
- कब तक पगले टिक पायेगा है तुम्हारा तास का,
- कब दर्शन देंगे तुलसी
- कब से खड़ा द्वारे, प्रभो! दर्शन दिला दो,
- कभी था उपवन में मधुमास
- कभी था सुन्दर यही शरीर
- कभी सिर पर थे काले केश
- कर दिया सब कुछ समर्पण
- कर न सको यदि
- कर ले ज्ञान अरे इंसान
- कर ले निज पहचान, द्वार तेरा खुल जाएगा।
- कर ले, हां, कर ले कुछ काम तू भलाई का,
- कर लो-कर लो छात्रों अपने जीवन का उत्थान रे
- कर संथारो स्वीकार भारी भार उठायो है।
- कर सत्कर्म सदा जीवन में तजकर फल की आशा,
- कर सहयोग भूल जाओ तुम है।
- करते गुरुवर को हम वन्दन
- करते तुम्हें शत-शत प्रणाम
- करते महावीर को वन्दन
- करते हैं तुमको नमन
- करनी से पहचान
- करमां री कहानी
- करुणा सागर वीर प्रभु को वन्दन शत्-शत् बार करें
- करूणा की धारा