गीतिका संग्रह — पृष्ठ 35
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- महाश्रमण गुरुवर जी दुनिया से न्यारे हैं,
- महाश्रमण शासन श्रृंगार
- महाश्रमण ही सहारा है
- महाश्रमणी अभ्यर्थना
- महाश्रमणी गण सिणगार, हिवड़े में बसिया।
- महाश्रमणी रो आयो है, चयन दिवस मनभावनो।
- ''महाश्रमणीजी के प्रति''
- महाश्रमणीवरम्
- महिमा प्रज्ञा की
- मा दीपां रा लाडला, वल्लू कुल उजियारा,
- मां
- मां की ममता हृदय विशाल
- मां की महिमा अजब निराली
- मां दीपां री कुक्षी
- मां दीपांजी रो लाडलो, भिखण हो शुभ अभिधान जी,
- मां वदना रा कूख उजागर, सद्गुण शेखर,
- मां वदनां रा लाडला, तेरापंथ रा आधार, म्हारै हिवड़े रा हार
- मां वदनाजी का नन्दन
- माटी री काया
- माटी री काया में, क्यूं मन! तूं लुभावै,
- माटी री मूरत है काया, क्यूं तूं देख लुभायो?
- माणक गणिवर मन भाया,
- माता त्रिशला रा सपना
- माता बालू के आंगन किलकारी की आवाज—२
- मान
- मान जा मेरे मन, छोड़दे बद्चलन,
- मानव
- मानव की पहचान अणुव्रत
- मानव जनम सब में
- मानव जीवन नादानी में क्यों खो रहे,
- मानव जीवन बीत रहा है भैय्या करना हो सो कर लो।
- मानव तन
- मानव तन तुझे अमूल्य मिला, फिर क्यों तू भटका। है?
- मानव तन है उज्ज्वल चादर।
- मानव दो दिन का मेहमान है,
- मानव मन के तले, संयम दीप जले,
- मानव-जीवन पाकर तुमने क्या किया।
- मानव-जीवन है दुर्लभ
- मानवता के प्रहरी!
- मानवता के मंगल
- मानवता के मीत को, श्रद्धासिक्त प्रणाम,
- माया
- माया का विस्तार
- माया की जंजीर
- माया की बहार
- माया के बन्दे
- माया नगरी में बनकर दीवाना,
- माया में फंसा क्यों राही, तुझे दूर बहुत जाना है,
- मार पड़े पर हार न मानें
- मार्यादा को शीष चढ़ाएंगे, भिक्षु बाबे को पलकों बिठाएंगे।
- माला फेरले रे बंदे
- मिनख जमारो औळो खोवै मतना,
- मिनख जमारो पायो भोला क्यूं तू व्यर्थ गमावै है
- मिनख-जमारो पायो लाभ तूं कमाई,
- मिनखा-देही रो मोल समझो म्हारा जीवड़ा,
- मिनखां देही मिली तनै अनमोल, अब तो सोच रे
- मिनखां देही री, मिनखां देही री, मिनखां देही री,
- मिनखां देही रो मोल सब कूंतो सही
- मिनखां! थे जागो रे,
- मिला अमित आनन्द आत्मबल,