गीतिका संग्रह — पृष्ठ 18
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- जीवन लाखीणो,
- जीवन विज्ञान
- जीवन सरस बनाना
- जीवन हर पल घटतो ही जावै रे,
- जीवन है जाबक छोटो,
- जीवन है वरदान सरीखो, तूं मस्ती स्यूं जी लै रै।
- जीवन-पथ का पाथेय बने,
- जीवन-विज्ञान गीत
- जीवन-संजीवन
- जीवनको सरसायें,
- जीवा! तू तो भोलो रे
- जुए की लत मत अपनाना।
- जुड़ा तुमसे सांसो का तार
- जुदाई र साथ में हैं जुड़े,
- जैन जगत् के तीर्थंकर
- जैन धर्म महान
- जैन धर्म हमको
- जैन विद्या का प्रशिक्षण सबको लेना है,
- जैन संत
- जैन संस्कार
- जैन सही में वे कहलाते, जिनवाणी जो अपनाते,
- जैनत्व की पहचान
- जैनमत मर्यादा स्मृति हेतु, महोत्सव छाया है,
- जैनी जीवनशैली
- जैसा भीतर, वैसा बाहर।
- जो अन्तर में ही रमण करे, बह सन्त पुरुष कहलाता है।
- जो कर्म किया वो भुगतना पड़ेगा।
- जो जागेगा वही पायेगा
- जो नवयुग का निर्माण करे, युगपुरुष उसी को कहते हैं।
- जो पल जावे
- जो मन खोजा आपना
- जो होनी वह होगी, क्यों तू रोये,
- ज्ञान दीप रोशन, होगा इसी से।
- ज्ञान बिन भव सिंधु
- ज्ञान रो उजालो घट में करलै क्यूं नी रे,
- ज्ञान से प्रकाश
- ज्ञानशाला प्यारी, बच्चों की फुलवारी,
- ज्ञानामृत का प्याला
- ज्ञाशाला का यह उपहार, घर-घर जागे सत्संस्कार,
- ज्यांरी मूरत है मनहारी, जन-जन जावै बलिहारी,
- ज्यादा सुनो और कम बोलो।
- ज्योति का अवतार बाबा
- ज्योति के सागर! तिमिर अज्ञान का हरदो,
- ज्योति जला
- ज्योति पुंज महावीर
- ज्योति बन कर सदा जलना,
- ज्योति बनके जलें
- ज्योति-पर्व पर श्रद्धा-अर्पण
- ज्योतिचरण जय हो
- ज्योतिपुरुष की जय-जयकार
- ज्योतिर्धाम, तुम्हें प्रणाम
- ज्योतिर्मय से
- *झरना बहता पल—पल, करता है ध्वनि कलकल,
- झरने की ज्यों बढ़ते जाना।
- झुकना सदा न श्रेयस्कर
- झूठ
- झूठ कभी मत बोलो, बच्चों!।
- झूठा नाता
- झूठो जग रो नातो,
- झूम-झूम गुण गाऊं रे