
आचार्य तुलसी
Life events
- 1936–1996
Life
- लाडनूं, कार्तिक शु. 2 (20-10-1914)
- झूमरमलजी खटेड़
- वदनाजी
- लाडनूं (राजस्थान), पौष कृष्णा 5
- गंगापुर (राजस्थान), भाद्रपद शु. 3
- गंगापुर (राजस्थान), भाद्रपद शु. 9
- बीदासर (राजस्थान), माघ शुक्ला 7
- दिल्ली
- लाडनूं (राजस्थान), पौष कृष्णा 5 — मुनि जीवन के 50 वर्ष
- आमेट (राजस्थान) — धर्मशासना के 50 वर्ष
- उदयपुर (राजस्थान), माघ शुक्ला पंचमी — राजस्थान विद्यापीठ कुल का सर्वोच्च अलंकरण
- दिल्ली
- सुजानगढ़ (राज.), माघ शुक्ला 7
- गंगाशहर (राज.), आषाढ़ कृ. 3 (23-6-1997)
Chaturmas · 60
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- Pali
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- Maharoli (Delhi)
- Ladnun
- Ladnun
Teerth
- Birth place
- Shanti Pratishthan
आचार्य तुलसी की चौरासी वर्ष और बासठ हजार मील की पदयात्रा 23 जून 1997 को पूर्ण हुई। उनका जन्म विक्रम संवत् 1971 में लाडनूँ (राजस्थान) में हुआ। संवत् 1982 में उन्होंने दीक्षा ली और संवत् 1993 में तेरापंथ के आचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए।
उनके हाथों 776 से अधिक साधु-साध्वियों ने दीक्षा ली। वे सिद्धहस्त कवि, सौ से अधिक पुस्तकों के लेखक और विशिष्ट धर्मनेता थे। संवत् 2005 में उन्होंने अणुव्रत आन्दोलन का प्रवर्तन किया।
साम्प्रदायिक भेदों से ऊपर उठकर वे जैन एकता के प्रबल समर्थक रहे; उनका सन्देश केवल जैनों के लिए नहीं, समस्त मानवता के लिए था। संवत् 2037 में उन्होंने 'समण-समणी' नाम की नई श्रेणी का सृजन किया, जिन्हें विदेश यात्रा की अनुमति है। डॉ.
राधाकृष्णन ने अपनी पुस्तक 'लिविंग विद् पर्पज़' में उन्हें विश्व के पन्द्रह महापुरुषों में स्थान दिया। 1971 में राष्ट्रपति वी. वी.
गिरि की अध्यक्षता में आयोजित समारोह में उन्हें 'युग-प्रधान' की उपाधि प्रदान की गई। अपने आचार्यकाल में उन्हें मुनि नथमल का — जो आगे चलकर 'युवाचार्य महाप्रज्ञ' कहलाए — अत्यन्त सहयोग मिला। साठ वर्षों तक चला उनका गुरु-शिष्य सम्बन्ध भारतीय परम्परा का उत्कृष्ट उदाहरण है।
1995 में उन्होंने आचार्य पद महाप्रज्ञ को सौंप दिया। 23 जून 1997 को गंगाशहर (राजस्थान) में उनका देवलोकगमन हुआ।