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‹ जप साधना

मंत्र-साधना-काल की शुद्धियां

1.द्रव्य—शुद्धि—विशुद्ध भावना पूर्वक मंत्र जपना ।

2.क्षेत्र—शुद्धि—एकान्त, कोलाहल, मक्खी—मच्छर रहित स्थान ।

3.समय—शुद्धि—प्रातः एवं सन्ध्या के समय कम से कम 45 मिनट तक महामंत्र—जप ।

4.आसन—शुद्धि—काष्‍ठपट्ट, शिलापट्ट, शुद्ध—भूमि तथा समशीतोष्ण | स्थान में किसी एक आसन में बैठकर माला जपना ।

5.विनय—शुद्धि—उच्चारण शुद्धि तथा जिस मंत्र का जप किया जा रहा है, उसके प्रति परम प्रीति भाव ।

6.मनःशुद्धि—दूषित वासनाओं का शोधन करके मानसिक एकाग्रता ।

7.वचन—शुद्धि—लयपूर्वक शुद्ध उच्चारण से जपना ।

8.काय—शुद्धि—शौचादि क्रियाओं से निवृत्त होकर सभी प्रकार से शुद्धतापूर्वक मंत्र जपना ।

जब तक मनुष्य के मन में राग—द्वेष की तरंगें चलती हैं, मन, क्रोध, ईर्ष्या और अभिमान से भरा रहता है, तब तक न जप काम करता है और न तप ।

—आचार्य तुलसी