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भक्तामर स्तोत्र

सम्पूर्ण भक्तामर — एक ही पाठ मेंआचार्य श्री महाश्रमण · 18 मिनट
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    भक्तामर - प्रणत - मौलिमणि - प्रभाणा-मुद्योतकं दलित-पाप-तमोवितानम्।सम्यक् प्रणम्य जिनपादयुगं युगादा-वालम्बनं भवजले पततां जनानाम्॥1॥

    भक्ति से नमे हुए देवताओं के मुकुटों की मणियों की प्रभा को उद्योतित करने वाले, पाप रूपी अंधकार के समूह को नष्ट करने वाले, तथा युग के आदि में भव-सागर में डूबते हुए जीवों के आलम्बन-स्वरूप जिनेन्द्र के चरण-युगल को भली भाँति प्रणाम करके —

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    यः संस्तुतः सकल-वाङ्मयतत्त्वबोधा-दुद्भूतबुद्धिपटुभिः सुरलोक-नाथैः।स्तोत्रैर् जगत्त्रितयचित्तहरैरुदारैःस्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम्॥2॥

    समस्त वाङ्मय के तत्त्व-ज्ञान से उत्पन्न प्रखर बुद्धि वाले देवलोक के स्वामियों ने तीनों जगत् के चित्त को हरने वाले उदार स्तोत्रों से जिनकी स्तुति की है, उन प्रथम जिनेन्द्र की स्तुति मैं भी करूँगा।

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    बुद्ध्या विनाऽपि विबुधार्चितपादपीठ!स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत-त्रपोऽहम्।बालं विहाय जलसंस्थितमिन्दुबिम्ब-मन्यः क इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम्॥3॥

    हे देवताओं द्वारा पूजित पाद-पीठ वाले! बुद्धि के बिना भी स्तुति करने को उद्यत मैं निर्लज्ज हूँ। बालक को छोड़कर और कौन मनुष्य जल में प्रतिबिम्बित चन्द्र-बिम्ब को सहसा पकड़ना चाहेगा?

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    वक्तुं गुणान् गुणसमुद्र! शशांककांतान्,कस्ते क्षमः सुरगुरुप्रतिमोऽपि बुद्धया।कल्पान्त - काल - पवनोद्धत - नक्रचक्रं,को वा तरीतुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम्॥4॥

    हे गुणों के समुद्र! चन्द्रमा के समान कान्त आपके गुणों को कहने में बृहस्पति के समान बुद्धिमान् भी कौन समर्थ है? प्रलय-काल की वायु से उठे हुए मगरमच्छों के समूह वाले समुद्र को भुजाओं से कौन तैर सकता है?

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    सोऽहं तथापि तव भक्तिवशान्मुनीश!कर्तुं स्तवं विगतशक्तिरपि प्रवृत्तः।प्रीत्याऽऽत्मवीर्यमविचार्य मृगो मृगेन्द्रं,नाभ्येति किं निजशिशोः परिपालनार्थम्॥5॥

    हे मुनीश! फिर भी वही मैं शक्ति-रहित होते हुए भी आपकी भक्ति के वश स्तुति करने को प्रवृत्त हुआ हूँ। क्या हिरणी अपने बल का विचार किए बिना, प्रेम से, अपने शिशु की रक्षा के लिए सिंह के सामने नहीं जाती?

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    अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहासधाम,त्वद्भक्तिरेव मुखरीकुरुते बलान्माम्।यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति,तच्चारु - चाम्र - कलिका - निकरैकहेतुः॥6॥

    अल्प-श्रुत तथा विद्वानों के उपहास का पात्र होते हुए भी आपकी भक्ति ही मुझे बलपूर्वक मुखर करती है। वसन्त में कोयल जो मधुर बोलती है, उसका एकमात्र कारण आम की सुन्दर मंजरियों का समूह ही है।

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    त्वत्संस्तवेन भवसन्तति-सन्निबद्धं,पापं क्षणात्क्षयमुपैति शरीरभाजाम्।आक्रान्त - लोकमलिनीलमशेषमाशु -सूर्यांशुभिन्नमिव शार्वरमन्धकारम्॥7॥

    आपकी स्तुति से देहधारियों का जन्म-जन्मान्तर से बँधा हुआ पाप क्षण-भर में क्षय को प्राप्त होता है — जैसे समस्त लोक में व्याप्त, भ्रमर के समान काला रात्रि का अन्धकार सूर्य की किरणों से भिन्न होकर शीघ्र नष्ट हो जाता है।

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    मत्वेति नाथ! तव संस्तवनं मयेद-मारभ्यते तनुधियापि तव प्रभावात्।चेतो हरिष्यति सतां नलिनीदलेषुमुक्ताफल-द्युतिमुपैति ननूदबिन्दुः॥8॥

    हे नाथ! ऐसा मानकर अल्प बुद्धि वाला होने पर भी आपके प्रभाव से मेरे द्वारा यह स्तवन आरम्भ किया जाता है। यह सज्जनों के चित्त को हरेगा — जैसे कमलिनी के पत्तों पर जल की बूँद मोती की कान्ति को प्राप्त होती है।

  9. 9/ 44

    आस्तां तव स्तवनमस्तसमस्त-दोषंत्वत्संकथापि जगतां दुरितानि हन्ति।दूरे सहस्रकिरणः कुरुते प्रभैवपद्माकरेषु जलजानि विकासभाञ्जि॥9॥

    समस्त दोषों को नष्ट करने वाला आपका स्तवन तो दूर रहे, आपकी कथा भी जगत् के पापों को नष्ट कर देती है। दूर स्थित सूर्य की प्रभा ही सरोवरों में कमलों को विकसित कर देती है।

  10. 10/ 44

    नात्यद्भुतं भुवनभूषण! भूतनाथ!भूतैर्गुणैर्भुवि भवन्तमभिष्टुवन्तः।तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन किं वाभूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति?॥10॥

    हे भुवन-भूषण! हे भूत-नाथ! यदि आपके यथार्थ गुणों से आपकी स्तुति करते हुए जन आपके समान हो जाते हैं तो इसमें अत्यन्त आश्चर्य नहीं। उस स्वामी से क्या, जो अपने आश्रित को अपने समान नहीं बना देता?

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    दृष्ट्वा भवन्तमनिमेषविलोकनीयंनान्यत्र तोषमुपयाति जनस्य चक्षुः।पीत्वा पयः शशिकरद्युति-दुग्धसिन्धोःक्षारं जलं जलनिधेरसितुं क इच्छेत्॥11॥

    अनिमेष दृष्टि से देखने योग्य आपको देखकर मनुष्य के नेत्र अन्यत्र सन्तोष नहीं पाते। चन्द्र-किरण के समान कान्ति वाले क्षीर-सागर का जल पीकर कौन समुद्र का खारा जल पीना चाहेगा?

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    यैः शान्तरागरुचिभिः परमाणुभिस्त्वंनिर्मापितस्त्रिभुवनैक - ललामभूत!तावन्त एव खलु तेऽप्यणवः पृथिव्यां,यत्ते समानमपरं नहि रूपमस्ति॥12॥

    हे त्रिभुवन के एकमात्र आभूषण-स्वरूप! शान्त-राग-कान्ति वाले जिन परमाणुओं से आप निर्मित हुए, वे उतने ही थे — क्योंकि पृथ्वी पर आपके समान दूसरा रूप है ही नहीं।

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    वक्त्रं क्व ते सुरनरोरगनेत्रहारिनिःशेष-निर्जित-जगत्-त्रितयोपमानम्।बिम्बं कलंकमलिनं क्व निशाकरस्ययद् वासरे भवति पाण्डुपलाशकल्पम्॥13॥

    देव, मनुष्य और नागों के नेत्रों को हरने वाला, तीनों जगत् की समस्त उपमाओं को जीत लेने वाला आपका मुख कहाँ, और कलंक से मलिन चन्द्रमा का बिम्ब कहाँ — जो दिन में पीले पलाश-पत्र के समान हो जाता है?

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    सम्पूर्णमंडल-शशांककलाकलाप-शुभ्रा गुणास्त्रिभुवनं तव लंघयन्ति।ये संश्रितास्त्रिजगदीश्वर-नाथमेकंकस्तान् निवारयति संचरतो यथेष्टम्॥14॥

    पूर्ण चन्द्र-मण्डल की कलाओं के समूह के समान शुभ्र आपके गुण तीनों भुवनों को लाँघ जाते हैं। हे त्रिजगदीश्वर! जो एक नाथ के आश्रित हैं, उन्हें इच्छानुसार विचरण करने से कौन रोक सकता है?

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    चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशांगनाभि-र्नीतं मनागपि मनो न विकार-मार्गम्।कल्पान्तकाल-मरुता चलिताचलेनकिं मन्दराद्रिशिखरं चलितं कदाचित्॥15॥

    इसमें क्या आश्चर्य कि देवांगनाओं ने आपके मन को तनिक भी विकार के मार्ग पर नहीं ले जाया? प्रलय-काल की पर्वतों को चला देने वाली वायु से क्या मन्दराचल का शिखर कभी चलित हुआ है?

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    निर्धूमवर्तिरपवर्जित-तैलपूरःकृत्स्नं जगत्रयमिदं प्रकटीकरोषि।गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानांदीपोऽपरस्त्वमसि नाथ! जगत्प्रकाशः॥16॥

    आप धूम-रहित बत्ती वाले, तेल के बिना भी इस समस्त त्रिलोक को प्रकाशित करते हैं। पर्वतों को चला देने वाली वायु भी आप तक नहीं पहुँच पाती। हे नाथ! आप जगत् को प्रकाशित करने वाले अपूर्व दीपक हैं।

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    नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्यः,स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज्जगन्ति।नाम्भोधरोदर-निरुद्धमहाप्रभावःसूर्यातिशायिमहिमासि मुनीन्द्र! लोके॥17॥

    आप कभी अस्त नहीं होते, न राहु से ग्रसे जाते हैं; आप सहसा एक साथ तीनों जगत् को प्रकट कर देते हैं। मेघों के उदर से आपका महाप्रभाव अवरुद्ध नहीं होता। हे मुनीन्द्र! लोक में आपकी महिमा सूर्य से भी बढ़कर है।

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    नित्योदयं दलितमोहमहान्धकारंगम्यं न राहुवदनस्य न वारिदानाम्।विभ्राजते तव मुखाब्जमनल्पकान्तिविद्योतयज्जगदपूर्व - शशांकबिम्बम्॥18॥

    नित्य उदय रहने वाला, मोह रूपी महान् अन्धकार को नष्ट करने वाला, राहु के मुख और मेघों से अगम्य — आपका अत्यन्त कान्तिमान् मुख-कमल जगत् को प्रकाशित करता हुआ अपूर्व चन्द्र-बिम्ब के समान सुशोभित होता है।

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    किं शर्वरीषु शशिनाह्नि विवस्वता वा?युष्मन्मुखेन्दु-दलितेषु तमस्सु नाथ!निष्पन्नशालिवनशालिनि जीवलोकेकार्य कियज्जलधरैर्जलभारनम्रैः॥19॥

    हे नाथ! आपके मुख-चन्द्र से अन्धकार के नष्ट हो जाने पर रात्रि में चन्द्रमा से और दिन में सूर्य से क्या प्रयोजन? पकी हुई धान की फसल से भरे जीव-लोक में जल के भार से झुके मेघों से कितना कार्य है?

  20. 20/ 44

    ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशंनैवं तथा हरिहरादिषु नायकेषु।तेजः स्फुरन्मणिषु याति यथा महत्त्वंनैवं तु काचशकले किरणाकुलेऽपि॥20॥

    जिस प्रकार आप में ज्ञान अवकाश पाकर सुशोभित होता है, वैसा हरि-हर आदि नायकों में नहीं। जैसे स्फुरित होती मणियों में तेज महत्त्व को प्राप्त होता है, वैसा किरणों से व्याप्त काँच के टुकड़े में नहीं।

  21. 21/ 44

    मन्ये वरं हरिहरादय एव दृष्टादृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति।किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्यःकश्चिन्मनो हरति नाथ! भवान्तरेऽपि॥21॥

    मैं मानता हूँ कि हरि-हर आदि का देखा जाना भी अच्छा ही रहा — क्योंकि उन्हें देख लेने पर हृदय आप में ही सन्तोष पाता है। हे नाथ! आपको देख लेने पर पृथ्वी पर अन्य कोई भवान्तर में भी मन को नहीं हर सकता।

  22. 22/ 44

    स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्,नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता।सर्वा दिशो दधति भानि सहस्ररश्मिं,प्राच्येव दिग् जनयति स्फुरदंशुजालम्॥22॥

    सैकड़ों स्त्रियाँ सैकड़ों पुत्रों को जन्म देती हैं, किन्तु किसी अन्य माता ने आपके समान पुत्र को जन्म नहीं दिया। सभी दिशाएँ नक्षत्रों को धारण करती हैं, पर स्फुरित किरण-जाल वाले सहस्र-रश्मि सूर्य को पूर्व दिशा ही उत्पन्न करती है।

  23. 23/ 44

    त्वामामनन्ति मुनयः परमं पुमांस-मादित्यवर्णममलं तमसः परस्तात्।त्वामेव सम्यगुपलभ्य जयन्ति मृत्युंनान्यः शिवः शिवपदस्य मुनीन्द्र! पन्थाः॥23॥

    मुनिजन आपको परम पुरुष, आदित्य के समान वर्ण वाला, निर्मल तथा अन्धकार से परे मानते हैं। आपको ही सम्यक् रूप से प्राप्त कर वे मृत्यु को जीतते हैं। हे मुनीन्द्र! शिव-पद का इसके अतिरिक्त कोई कल्याणकारी मार्ग नहीं।

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    त्वामव्ययं विभुमचिन्त्यमसंख्यमाद्यंब्रह्माणमीश्वरमनन्तमनंगकेतुम्।योगीश्वरं विदितयोगमनेकमेकंज्ञानस्वरूपममलं प्रवदन्ति सन्तः॥24॥

    सन्त आपको अव्यय, विभु, अचिन्त्य, असंख्य, आदि, ब्रह्मा, ईश्वर, अनन्त, अनङ्ग-केतु, योगीश्वर, योग के ज्ञाता, अनेक तथा एक, और ज्ञान-स्वरूप निर्मल कहते हैं।

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    बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चितबुद्धि-बोधात्त्वं शंकरोऽसि भुवनत्रय-शंकरत्वात्।धाताऽसि धीर! शिवमार्गविधेर्विधानात्व्यक्तं त्वमेव भगवन्! पुरुषोत्तमोऽसि॥25॥

    विबुधों द्वारा पूजित बुद्धि-बोध के कारण आप ही बुद्ध हैं; तीनों भुवनों का कल्याण करने से आप ही शंकर हैं; हे धीर! मोक्ष-मार्ग की विधि के विधान से आप ही धाता हैं; हे भगवन्! स्पष्ट है कि आप ही पुरुषोत्तम हैं।

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    तुभ्यं नमस्त्रिभुवनार्तिहराय नाथ!तुभ्यं नमः क्षितितलामलभूषणाय।तुभ्यं नमस्त्रिजगतः परमेश्वराय,तुभ्यं नमो जिन! भवोदधि-शोषणाय॥26॥

    हे नाथ! तीनों भुवनों की पीड़ा हरने वाले आपको नमस्कार। पृथ्वी-तल के निर्मल आभूषण-स्वरूप आपको नमस्कार। तीनों जगत् के परमेश्वर आपको नमस्कार। हे जिन! भव-सागर को सुखा देने वाले आपको नमस्कार।

  27. 27/ 44

    को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणैरशेषैःत्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश!दोषैरुपात्त-विविधाश्रय-जातगर्वैःस्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि॥27॥

    हे मुनीश! इसमें क्या आश्चर्य कि समस्त गुणों ने अन्यत्र अवकाश न पाकर आपका आश्रय ले लिया? विविध आश्रयों को पाकर गर्वित हुए दोषों ने तो आपको स्वप्न में भी कभी नहीं देखा।

  28. 28/ 44

    उच्चैरशोकतरुसंश्रितमुन्मयूख-माभाति रूपममलं भवतो नितान्तम्।स्पष्टोल्लसत् किरणमस्ततमोवितानंबिम्बं रवेरिव पयोधर-पार्श्ववर्ति॥28॥

    ऊँचे अशोक-वृक्ष के नीचे स्थित, ऊर्ध्व किरणों वाला आपका निर्मल रूप अत्यन्त सुशोभित होता है — जैसे स्पष्ट रूप से उल्लसित किरणों वाला, अन्धकार के विस्तार को नष्ट करता हुआ सूर्य-बिम्ब मेघ के पार्श्व में स्थित हो।

  29. 29/ 44

    सिंहासने मणिमयूखशिखाविचित्रेविभ्राजते तव वपुः कनकावदातम्।बिम्बं वियद्-विलसदंशुलता-वितानंतुंगोदयाद्रि-शिरसीव सहस्ररश्मेः॥29॥

    मणियों की किरण-शिखाओं से विचित्र सिंहासन पर स्वर्ण के समान उज्ज्वल आपका शरीर सुशोभित होता है — जैसे ऊँचे उदयाचल के शिखर पर आकाश में विलसित किरण-लताओं के वितान वाला सहस्र-रश्मि सूर्य का बिम्ब।

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    कुन्दावदात-चलचामर-चारुशोभंविभ्राजते तव वपुः कलधौतकान्तम्।उद्यच्छशांक-शुचिनिर्झर-वारिधार-मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव शातकौम्भम्॥30॥

    कुन्द-पुष्प के समान श्वेत चलते हुए चामरों की सुन्दर शोभा वाला, स्वर्ण के समान कान्त आपका शरीर सुशोभित होता है — जैसे उदित होते चन्द्रमा के समान शुचि निर्झर की जल-धारा वाला सुमेरु का ऊँचा स्वर्णिम तट।

  31. 31/ 44

    छत्र-त्रयं तव विभाति शशांककान्त-मुच्चैः स्थितं स्थगितभानुकर-प्रतापम्।मुक्ताफल-प्रकरजाल-विवृद्धशोभंप्रख्यापयत् त्रिजगतः परमेश्वरत्वम्॥31॥

    चन्द्रमा के समान कान्त, ऊँचे स्थित, सूर्य-किरणों के ताप को रोकने वाला, मोतियों के समूह-जाल से बढ़ी हुई शोभा वाला आपका छत्र-त्रय तीनों जगत् के परमेश्वरत्व की घोषणा करता हुआ सुशोभित होता है।

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    उन्निद्रहेम-नवपंकजपुंजकान्तीपर्युल्लसन्-नखमयूखशिखाभिरामौ।पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र! धत्तःपद्मानि तत्र विबुधाः परिकल्पयन्ति॥32॥

    हे जिनेन्द्र! विकसित स्वर्ण-कमलों के समूह की कान्ति वाले, चारों ओर उल्लसित नख-किरणों की शिखाओं से अभिराम आपके चरण जहाँ पद रखते हैं, वहाँ देवगण कमलों की रचना कर देते हैं।

  33. 33/ 44

    इत्थं यथा तव विभूतिरभूज्जिनेन्द्र!धर्मोपदेशनविधौ न तथा परस्य।यादृक् प्रभा दिनकृतः प्रहतान्धकारातादृक् कुतो ग्रह-गणस्य विकाशिनोऽपि॥33॥

    हे जिनेन्द्र! धर्मोपदेश की विधि में जैसी विभूति आपकी हुई, वैसी दूसरे की नहीं। अन्धकार को नष्ट करने वाली जैसी प्रभा सूर्य की है, वैसी विकासशील ग्रह-गणों की कहाँ से हो?

  34. 34/ 44

    श्च्योतन् मदाविलविलोलकपोलमूल-मत्तभ्रमद्-भ्रमरनाद-विवृद्धकोपम्।ऐरावताभमिभमुद्धतमापतन्तंदृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम्॥34॥

    मद से मलिन, चंचल कपोल-मूल वाले, मत्त भ्रमरों के नाद से बढ़े हुए क्रोध वाले, ऐरावत के समान उद्धत सामने आते हुए हाथी को देखकर भी आपके आश्रितों को भय नहीं होता।

  35. 35/ 44

    भिन्नेभ-कुम्भ-गलदुज्ज्वल-शोणिताक्त-मुक्ताफल-प्रकर-भूषितभूमिभागः।बद्धक्रमः क्रमगतं हरिणाधिपोऽपिनाक्रामति क्रमयुगाचलसंश्रितं ते॥35॥

    फाड़े हुए हाथी के कुम्भ-स्थल से गिरते उज्ज्वल रक्त से सने मोतियों के समूह से भूमि-भाग को विभूषित करने वाला सिंह भी, पैर बढ़ाकर भी, आपके चरण-युगल रूपी अचल का आश्रय लेने वाले पर आक्रमण नहीं करता।

  36. 36/ 44

    कल्पान्तकाल-पवनोद्धत-वह्निकल्पंदावानलं ज्वलितमुज्ज्वलमुत्स्फुलिंगम्।विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुखमापतन्तंत्वन्नामकीर्तनजलं शमयत्यशेषम्॥36॥

    प्रलय-काल की वायु से उद्धत अग्नि के समान, प्रज्वलित, उज्ज्वल, चिंगारियों वाला, मानो विश्व को निगलने को सम्मुख आता हुआ दावानल — आपके नाम-कीर्तन रूपी जल से समूल शान्त हो जाता है।

  37. 37/ 44

    रक्तेक्षणं समदकोकिल-कण्ठनीलंक्रोधोद्धतं फणिनमुत्फणमापतन्तम्।आक्रामति क्रमयुगेन निरस्तशंक-स्त्वन्नामनागदमनी हृदि यस्य पुंसः॥37॥

    लाल नेत्रों वाले, मदमत्त कोयल के कण्ठ के समान नीले, क्रोध से उद्धत, फण उठाए सामने आते हुए सर्प को — जिस पुरुष के हृदय में आपका नाम रूपी नागदमनी है — वह निःशंक होकर चरणों से लाँघ जाता है।

  38. 38/ 44

    वल्गत्तुरंग-गजगर्जित-भीमनाद-माजौ बलं बलवतामपि भूपतीनाम्।उद्यद्दिवाकरमयूख-शिखापविद्धंत्वत्कीर्तनात् तम इवाशु भिदामुपैति॥38॥

    उछलते घोड़ों और गजों की गर्जना के भीम नाद वाली रण-भूमि में बलवान् राजाओं की सेना भी आपके कीर्तन से शीघ्र भेद को प्राप्त होती है — जैसे उदित होते सूर्य की किरण-शिखाओं से बिंधा हुआ अन्धकार।

  39. 39/ 44

    कुन्ताग्रभिन्न - गजशोणित - वारिवाह-वेगावतार-तरणातुरयोध-भीमे।युद्धे जयं विजितदुर्जयजेयपक्षाःत्वत्पाद-पंकजवनाश्रयिणो लभन्ते॥39॥

    भालों के अग्र-भाग से भिन्न हुए हाथियों के रक्त रूपी जल-प्रवाह के वेग में उतरकर तैरने को आतुर योद्धाओं से भीषण युद्ध में, आपके चरण-कमल-वन का आश्रय लेने वाले दुर्जय पक्ष को जीतकर जय प्राप्त करते हैं।

  40. 40/ 44

    अम्भोनिधौ क्षुभितभीषणनक्रचक्र-पाठीन-पीठभयदोल्वणवाडवाग्नौ।रंगत्तरंग-शिखरस्थित-यानपात्रा-स्त्रासं विहाय भवतः स्मरणाद् व्रजन्ति॥40॥

    क्षुभित भीषण मगरमच्छों के समूह तथा पाठीन-पीठ मत्स्यों से भयदायक, प्रचण्ड वडवाग्नि वाले समुद्र में, उछलती तरंगों के शिखर पर स्थित जहाज़ वाले लोग आपके स्मरण से भय छोड़कर पार चले जाते हैं।

  41. 41/ 44

    उद्भूतभीषणजलोदर-भारभुग्नाःशोच्यां दशामुपगताश्च्युतजीविताशाः।त्वत्पाद-पंकजरजोऽमृतदिग्धदेहामर्त्या भवन्ति मकरध्वजतुल्यरूपाः॥41॥

    उत्पन्न हुए भीषण जलोदर के भार से झुके हुए, शोचनीय दशा को प्राप्त, जीवन की आशा से च्युत मनुष्य भी आपके चरण-कमलों की रज रूपी अमृत से देह के लिप्त होने पर कामदेव के समान रूप वाले हो जाते हैं।

  42. 42/ 44

    आपाद-कण्ठमुरुशृंखल-वेष्टितांगाः,गाढं बृहन्निगडकोटि-निघृष्टजंघाः।त्वन्नाममन्त्रमनिशं मनुजाः स्मरन्तः,सद्यः स्वयं विगतबन्धभया भवन्ति॥42॥

    पैर से कण्ठ तक भारी शृंखलाओं से वेष्टित अंग वाले, बड़ी बेड़ियों की कोटियों से घिसी हुई जंघाओं वाले मनुष्य भी आपके नाम-मन्त्र का निरन्तर स्मरण करते हुए तत्काल स्वयं बन्धन के भय से रहित हो जाते हैं।

  43. 43/ 44

    मत्तद्विपेन्द्र-मृगराज-दवानलाहि-संग्राम-वारिधि-महोदर-बंधनोत्थम्।तस्याशु नाशमुपयाति भयं भियेवयस्तावकं स्तवमिमं मतिमानधीते॥43॥

    मत्त गजेन्द्र, मृगराज, दावानल, सर्प, संग्राम, समुद्र, महोदर तथा बन्धन से उत्पन्न भय — जो बुद्धिमान् आपके इस स्तवन को पढ़ता है, उसका वह भय मानो स्वयं भयभीत होकर शीघ्र नाश को प्राप्त होता है।

  44. 44/ 44

    स्तोत्रस्रजं तव जिनेन्द्र! गुणैर्निबद्धां,भक्त्या मया रुचिरवर्णविचित्रपुष्पाम्।धत्ते जनो य इह कंठगतामजस्रंतं मानतुंगमवशा समुपैति लक्ष्मीः॥44॥

    हे जिनेन्द्र! आपके गुणों से गूँथी हुई, मेरे द्वारा भक्ति से विविध वर्णों के विचित्र पुष्पों वाली इस स्तोत्र-माला को जो मनुष्य निरन्तर कण्ठ में धारण करता है, उस मानतुङ्ग को लक्ष्मी स्वयं वशीभूत होकर प्राप्त होती है।