भक्तामर - प्रणत - मौलिमणि - प्रभाणा-मुद्योतकं दलित-पाप-तमोवितानम्।सम्यक् प्रणम्य जिनपादयुगं युगादा-वालम्बनं भवजले पततां जनानाम्॥1॥
भक्ति से नमे हुए देवताओं के मुकुटों की मणियों की प्रभा को उद्योतित करने वाले, पाप रूपी अंधकार के समूह को नष्ट करने वाले, तथा युग के आदि में भव-सागर में डूबते हुए जीवों के आलम्बन-स्वरूप जिनेन्द्र के चरण-युगल को भली भाँति प्रणाम करके —