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जैन वाणी का
शांत संग्रह

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आज का पाठ

ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं नैवं तथा हरिहरादिषु नायकेषु।

जिस प्रकार आप में ज्ञान अवकाश पाकर सुशोभित होता है, वैसा हरि-हर आदि नायकों में नहीं। जैसे स्फुरित होती मणियों में तेज महत्त्व को प्राप्त होता है, वैसा किरणों से व्याप्त काँच के टुकड़े में नहीं।

भक्तामर स्तोत्र · श्लोक 20

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