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भय-निवारण — भक्तामर पाठ

परंपरा में भय और चिंता के समय इन पाठों का वाचन बताया गया है।

भय-निवारण का प्रसंग

भक्तामर के अंतिम भाग में भय के विविध रूपों का वर्णन विस्तार से आता है — गज, सिंह, अग्नि, सर्प, युद्ध, समुद्र, रोग और बंधन। परंपरा में इन्हें अष्ट-महाभय कहा गया है, और स्तोत्र का यह भाग सबसे अधिक स्मरण किया जाने वाला भाग है।

ये श्लोक भय को अस्वीकार नहीं करते; वे यह कहते हैं कि जिसका चित्त प्रभु के स्मरण में स्थिर है, उस पर भय का प्रभाव शिथिल पड़ जाता है। भाव भीतर का है, और उसी पर बल है।

इनका चयन कैसे हुआ

यहाँ वे श्लोक संकलित हैं जिनमें भय, संकट अथवा आपत्ति का उल्लेख प्रत्यक्ष रूप से आता है — मुख्यतः स्तोत्र का वह भाग जो महाभयों का वर्णन करता है।

परंपरा में इन श्लोकों का पाठ यात्रा, संकट अथवा अनिश्चय के समय बताया गया है; यह उसी भाव का संग्रह है।

संकट के क्षण में स्मरण

परंपरा इन श्लोकों को भय का नाश करने वाला मंत्र नहीं कहती, स्मरण का आधार कहती है। भय स्वाभाविक है; जैन दृष्टि में उसे दबाना नहीं, उसके साथ स्थिर रहना सिखाया गया है। अभय की साधना का अर्थ निर्भय हो जाना नहीं, भय के रहते हुए विवेक न खोना है।

भय अथवा संकट के क्षण में पूरा स्तोत्र स्मरण करना सदैव संभव नहीं होता। ऐसी स्थिति के लिए यह चयन है — कुछ श्लोक, जो उसी प्रसंग को सीधे कहते हैं।

नीचे प्रत्येक श्लोक अपने पृष्ठ से जुड़ा है, जहाँ मूल पाठ के साथ अर्थ भी है। महाभयों के जिन श्लोकों की चर्चा ऊपर हुई, उन्हें वहाँ पूरा पढ़ा जा सकता है।

14 श्लोक

पाठ की विधि

भय अथवा अनिश्चय के समय, जहाँ भी हों, मन में इनका स्मरण किया जा सकता है — परंपरा में इसके लिए किसी विशेष स्थान अथवा समय का बंधन नहीं बताया गया।

नियमित पाठ करना हो तो प्रातःकाल का समय उपयुक्त माना गया है, और उच्चारण स्पष्ट रखने पर बल दिया गया है।