स्वास्थ्य — भक्तामर पाठ
परंपरा में आरोग्य की कामना हेतु इन पाठों का वाचन बताया गया है।
स्वास्थ्य का प्रसंग
परंपरा में रोग और शारीरिक कष्ट के समय भक्तामर के कुछ श्लोकों का वाचन बताया गया है। इसका आधार यह भाव है कि स्तुति से चित्त स्थिर होता है, और स्थिर चित्त कष्ट को सहने की शक्ति देता है — न कि यह कि पाठ औषधि का काम करता है।
यह भेद महत्त्वपूर्ण है और परंपरा में भी स्पष्ट रहा है। जैन आचार्यों ने चिकित्सा को कभी अस्वीकार नहीं किया; आगम-साहित्य में वैद्य और औषधि दोनों का उल्लेख सहज रूप से मिलता है। पाठ उसके स्थान पर नहीं, उसके साथ है।
इनका चयन कैसे हुआ
यहाँ वे श्लोक रखे गए हैं जिनमें पीड़ा, व्याधि अथवा शारीरिक कष्ट का प्रसंग आता है, अथवा जिनमें आरोग्य और स्वस्थ जीवन की कामना व्यक्त हुई है।
रोग की स्थिति में सर्वप्रथम योग्य चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। यह पृष्ठ परंपरा में वर्णित पाठ का संग्रह है, चिकित्सा-परामर्श नहीं।
परंपरा में यह भी कहा गया है कि रोगी के पास बैठकर पाठ करना सेवा का ही एक रूप है। जैन आचार में सेवा — विशेषतः रुग्ण और वृद्ध की सेवा — को उच्च स्थान दिया गया है, और वैयावृत्त्य को आभ्यंतर तप में गिना गया है।
इसलिए इन श्लोकों का पाठ केवल अपने लिए नहीं, किसी अन्य के लिए भी किया जाता रहा है। भाव यह रहता है कि जो कष्ट में है, उसका चित्त कुछ स्थिर हो — और जो पाठ कर रहा है, उसका भी।
रुग्णावस्था में पाठ का क्रम
रुग्णावस्था में लंबे पाठ की सामर्थ्य प्रायः नहीं होती — यह चयन उसी स्थिति के लिए है, ताकि थोड़े श्लोकों में भी पाठ का क्रम बना रहे।
नीचे की सूची में प्रत्येक श्लोक अपने पृष्ठ से जुड़ा है, जहाँ संस्कृत मूल के साथ लिप्यंतरण और हिंदी अर्थ दोनों दिए गए हैं — रोगी को सुनाना हो तो अर्थ साथ रखना उपयोगी रहता है।
12 श्लोक
- किं शर्वरीषु शशिनाह्नि विवस्वता वा?
- ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं
- मन्ये वरं हरिहरादय एव दृष्टा
- स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्,
- त्वामामनन्ति मुनयः परमं पुमांस-
- त्वामव्ययं विभुमचिन्त्यमसंख्यमाद्यं
- बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चितबुद्धि-बोधात्
- तुभ्यं नमस्त्रिभुवनार्तिहराय नाथ!
- को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणैरशेषैः
- उच्चैरशोकतरुसंश्रितमुन्मयूख-
- सिंहासने मणिमयूखशिखाविचित्रे
- कुन्दावदात-चलचामर-चारुशोभं
पाठ की विधि
रोगी स्वयं पाठ करने में असमर्थ हो तो परंपरा में परिजन द्वारा पाठ करने का भी विधान बताया गया है। पाठ शांत वातावरण में, धीमे स्वर में किया जाए।
यहाँ भी संख्या का कोई अनिवार्य बंधन नहीं है। और यह दोहराना आवश्यक है — पाठ किसी भी स्थिति में चिकित्सा का विकल्प नहीं है।