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विद्या एवं बुद्धि — भक्तामर पाठ

परंपरा में अध्ययन और स्मृति हेतु इन पाठों का वाचन बताया गया है।

विद्या और बुद्धि का प्रसंग

जैन परंपरा में ज्ञान की प्रतिष्ठा सर्वोपरि है — पाँच ज्ञानों का विस्तृत विवेचन आगमों का एक बड़ा भाग है, और ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम को विद्या-प्राप्ति का वास्तविक कारण माना गया है।

इस दृष्टि से विद्या के लिए किया जाने वाला पाठ स्मृति या बुद्धि का कोई सीधा उपाय नहीं, बल्कि चित्त की एकाग्रता का अभ्यास है। एकाग्र चित्त ही अध्ययन को ग्रहण कर पाता है — यही भाव इन श्लोकों के पीछे है।

इनका चयन कैसे हुआ

यहाँ वे श्लोक हैं जिनमें ज्ञान, प्रकाश, अज्ञान-नाश अथवा बुद्धि की निर्मलता का प्रसंग आता है। भक्तामर में प्रभु को बार-बार प्रकाश और ज्ञान के रूपक से स्मरण किया गया है, और वही रूपक इस चयन का आधार है।

विद्यार्थियों के लिए परंपरा में इसका पाठ अध्ययन से पूर्व बताया गया है — इस भाव से कि मन बैठ जाए, फिर पढ़ाई आरंभ हो।

अध्ययन के दिनों में

परंपरा में श्रुत-भक्ति का अपना स्थान है — ज्ञान और ज्ञान के साधनों के प्रति आदर का भाव। पुस्तक को पाँव न लगे, अध्ययन से पूर्व हाथ स्वच्छ हों, ऐसे छोटे नियम इसी भाव से आए हैं और आज भी घरों में निभाए जाते हैं।

इन नियमों का उद्देश्य बाहरी शुद्धि नहीं, भीतर का भाव है। जो वस्तु आदर से ली जाती है, चित्त उसमें सहज ही लगता है — विद्या के प्रसंग में परंपरा का यही आग्रह रहा है।

विद्यार्थी के लिए यह विशेष रूप से उपयोगी है — परीक्षा अथवा अध्ययन के दिनों में पूरे स्तोत्र का समय न मिले, तो इन श्लोकों से आरंभ किया जा सकता है, और अवकाश में सम्पूर्ण पाठ।

नीचे की सूची से प्रत्येक श्लोक का पूरा पृष्ठ खुलता है, जिसमें लिप्यंतरण और शब्दार्थ भी हैं। विद्यार्थी के लिए शब्दार्थ विशेष उपयोगी है, क्योंकि उससे पाठ केवल उच्चारण न रहकर अध्ययन बन जाता है।

5 श्लोक

पाठ की विधि

अध्ययन आरंभ करने से पूर्व, स्वच्छ स्थान पर बैठकर पाठ करने का विधान बताया गया है। परंपरा में प्रातःकाल को इसके लिए विशेष उपयुक्त माना गया है।

पाठ के पश्चात् कुछ क्षण मौन रहकर बैठना उचित बताया गया है, जिससे चित्त स्थिर होकर अध्ययन में प्रवृत्त हो सके।