समृद्धि — भक्तामर पाठ
परंपरा में आजीविका और स्थिरता हेतु इन पाठों का वाचन बताया गया है।
समृद्धि का प्रसंग
समृद्धि से जैन परंपरा का तात्पर्य केवल धन नहीं है। श्रावक के लिए अर्थ-अर्जन वर्जित नहीं, किंतु उसका आधार न्याय होना चाहिए — "न्यायोपात्त धन" की अवधारणा श्रावकाचार का मूल है। जो धन अन्याय से आया, उसे परंपरा समृद्धि नहीं मानती।
इस दृष्टि से समृद्धि के लिए किया जाने वाला पाठ धन का उपाय नहीं, बल्कि संतोष और विवेक का अभ्यास है। परिग्रह-परिमाण — अर्थात् संग्रह की सीमा स्वयं तय करना — श्रावक के बारह व्रतों में है।
इनका चयन कैसे हुआ
यहाँ वे श्लोक हैं जिनमें ऐश्वर्य, वैभव अथवा प्रभु की महिमा के विस्तार का वर्णन आता है — भक्तामर में प्रभु के समवसरण और उनकी विभूति का वर्णन विस्तार से मिलता है, और वही इस चयन का आधार है।
नए कार्य, व्यवसाय अथवा गृह-प्रवेश के अवसर पर परंपरा में इनका पाठ बताया गया है।
नए आरंभ के अवसर पर
परंपरा में यह भी कहा गया है कि जो मिला है उसका सदुपयोग स्वयं समृद्धि का अंग है। दान, विशेषतः सुपात्र-दान, श्रावक के दैनिक कर्तव्यों में गिना गया है, और संचय की सीमा तय करना बारह व्रतों में आता है।
नए कार्य के आरंभ जैसे अवसरों पर परंपरा में पूरे स्तोत्र का पाठ अधिक प्रचलित रहा है; यह चयन उनके लिए है जिनके पास समय की सीमा हो।
नीचे की सूची से प्रत्येक श्लोक का अपना पृष्ठ खुलता है, जहाँ मूल संस्कृत, लिप्यंतरण और हिंदी अर्थ एक साथ दिए गए हैं। समवसरण और विभूति के जिन वर्णनों की बात ऊपर हुई, वे वहीं विस्तार से मिलेंगे।
11 श्लोक
- नात्यद्भुतं भुवनभूषण! भूतनाथ!
- दृष्ट्वा भवन्तमनिमेषविलोकनीयं
- यैः शान्तरागरुचिभिः परमाणुभिस्त्वं
- वक्त्रं क्व ते सुरनरोरगनेत्रहारि
- सम्पूर्णमंडल-शशांककलाकलाप-
- चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशांगनाभि-
- निर्धूमवर्तिरपवर्जित-तैलपूरः
- नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्यः,
- नित्योदयं दलितमोहमहान्धकारं
- किं शर्वरीषु शशिनाह्नि विवस्वता वा?
- ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं
पाठ की विधि
नए कार्य के आरंभ में, प्रातःकाल पाठ करने का विधान बताया गया है। परंपरा में इसे संकल्प के साथ जोड़ा गया है — क्या करना है, यह स्पष्ट हो, तभी पाठ का भाव पूर्ण होता है।
यहाँ भी पूरे स्तोत्र का पाठ सर्वोत्तम माना गया है; ये श्लोक केवल प्रसंग के अनुसार एकत्र किए गए हैं।