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श्लोक 10

10

नात्यद्भुतं भुवन-भूषण! भूत-नाथ भूतैर्गुणैर्भुवि भवन्तमभिष्टुवन्तः । तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन किं वा भूत्याश्रितं य इह नात्म-समं करोति ॥१०॥


हे भुवन-भूषण! हे भूत-नाथ! यदि आपके यथार्थ गुणों से आपकी स्तुति करते हुए जन आपके समान हो जाते हैं तो इसमें अत्यन्त आश्चर्य नहीं। उस स्वामी से क्या, जो अपने आश्रित को अपने समान नहीं बना देता?

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