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श्लोक 9

9

आस्तां तव स्तवनमस्त-समस्त-दोषं त्वत्सङ्कथापि जगतां दुरितानि हन्ति । दूरे सहस्र-किरणः कुरुते प्रभैव पद्माकरेषु जलजानि विकाश-भाञ्जि ॥९॥


समस्त दोषों को नष्ट करने वाला आपका स्तवन तो दूर रहे, आपकी कथा भी जगत् के पापों को नष्ट कर देती है। दूर स्थित सूर्य की प्रभा ही सरोवरों में कमलों को विकसित कर देती है।

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