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श्लोक 20

20

ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं नैवं तथा हरि-हरादिषु नायकेषु । तेजः स्फुरन्मणिषु याति यथा महत्त्वं नैवं तु काच-शकले किरणाकुलेऽपि ॥२०॥


जिस प्रकार आप में ज्ञान अवकाश पाकर सुशोभित होता है, वैसा हरि-हर आदि नायकों में नहीं। जैसे स्फुरित होती मणियों में तेज महत्त्व को प्राप्त होता है, वैसा किरणों से व्याप्त काँच के टुकड़े में नहीं।

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