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श्लोक 21

21

मन्ये वरं हरि-हरादय एव दृष्टा दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति । किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्यः कश्चिन्मनो हरति नाथ! भवान्तरेऽपि ॥२१॥


मैं मानता हूँ कि हरि-हर आदि का देखा जाना भी अच्छा ही रहा — क्योंकि उन्हें देख लेने पर हृदय आप में ही सन्तोष पाता है। हे नाथ! आपको देख लेने पर पृथ्वी पर अन्य कोई भवान्तर में भी मन को नहीं हर सकता।

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