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श्लोक 17

17

नास्तं कदाचिदुपयासि न राहु-गम्यः स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज्जगन्ति । नाम्भोधरोदर-निरुद्ध-महा-प्रभावः सूर्यातिशायि-महिमासि मुनीन्द्र! लोके ॥१७॥


आप कभी अस्त नहीं होते, न राहु से ग्रसे जाते हैं; आप सहसा एक साथ तीनों जगत् को प्रकट कर देते हैं। मेघों के उदर से आपका महाप्रभाव अवरुद्ध नहीं होता। हे मुनीन्द्र! लोक में आपकी महिमा सूर्य से भी बढ़कर है।

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