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श्लोक 16

16

निर्धूम-वर्तिरपवर्जित-तैल-पूरः कृत्स्नं जगत्त्रयमिदं प्रकटीकरोषि । गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ! जगत्प्रकाशः ॥१६॥


आप धूम-रहित बत्ती वाले, तेल के बिना भी इस समस्त त्रिलोक को प्रकाशित करते हैं। पर्वतों को चला देने वाली वायु भी आप तक नहीं पहुँच पाती। हे नाथ! आप जगत् को प्रकाशित करने वाले अपूर्व दीपक हैं।

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