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श्लोक 15

15

चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशाङ्गनाभि- र्नीतं मनागपि मनो न विकार-मार्गम् । कल्पान्त-काल-मरुता चलिताचलेन किं मन्दराद्रि-शिखिरं चलितं कदाचित् ॥१५॥


इसमें क्या आश्चर्य कि देवांगनाओं ने आपके मन को तनिक भी विकार के मार्ग पर नहीं ले जाया? प्रलय-काल की पर्वतों को चला देने वाली वायु से क्या मन्दराचल का शिखर कभी चलित हुआ है?

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