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यात्रा-सुरक्षा — भक्तामर पाठ

परंपरा में प्रवास से पूर्व इन पाठों का वाचन बताया गया है।

यात्रा-सुरक्षा का प्रसंग

यात्रा से पूर्व स्मरण की परंपरा जैन आचार में पुरानी है। इसका एक व्यावहारिक कारण भी रहा है: प्राचीन काल में यात्रा वास्तव में जोखिम भरी थी, और साधु-साध्वियों के विहार तथा श्रावकों की तीर्थयात्रा — दोनों के लिए मंगल-पाठ का विधान बना।

भक्तामर में समुद्र, जल-संकट और मार्ग के भय का उल्लेख प्रत्यक्ष रूप से आता है, इसलिए यात्रा के प्रसंग से इसका संबंध सहज है।

इनका चयन कैसे हुआ

यहाँ वे श्लोक रखे गए हैं जिनमें मार्ग, समुद्र, जल अथवा यात्रा-संबंधी संकट का प्रसंग आता है।

तीर्थयात्रा के प्रसंग में परंपरा में सम्पूर्ण स्तोत्र का पाठ ही अधिक प्रचलित है; यह चयन केवल विशेष प्रसंग के लिए है।

मार्ग में पाठ

तीर्थयात्रा को परंपरा में केवल स्थान-दर्शन नहीं माना गया। यात्रा में संयम, सहनशीलता और सह-यात्रियों के प्रति सद्भाव — ये सब उसके अंग हैं, और मार्ग की असुविधा को समभाव से लेना स्वयं एक अभ्यास कहा गया है।

साधु-साध्वियों का विहार पैदल होता है, और उसी परंपरा से श्रावकों की यात्रा में भी सादगी का आग्रह रहा है। जो मार्ग सुविधा के लिए नहीं, दर्शन के लिए चला जाता है, उसमें कष्ट भी यात्रा का ही अंग माना गया है।

यात्रा में समय और स्थान दोनों की सीमा रहती है, इसलिए यह चयन उपयोगी हो सकता है। तीर्थयात्रा जैसे अवसरों पर परंपरा में पूरे स्तोत्र का पाठ ही अधिक प्रचलित रहा है।

नीचे की सूची से प्रत्येक श्लोक का पृष्ठ खुलता है, जहाँ मूल पाठ अंग्रेज़ी अक्षरों में भी दिया गया है — यात्रा में हिंदी पढ़ना कठिन हो तो वह काम आता है।

6 श्लोक

पाठ की विधि

प्रस्थान से पूर्व, घर से निकलते समय पाठ करने का विधान बताया गया है। मार्ग में भी मन में स्मरण किया जा सकता है।

परंपरा में यह भी कहा गया है कि यात्रा में सावधानी स्वयं एक धर्म है — पाठ के साथ विवेक भी आवश्यक है।