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श्लोक 43

मत्तद्विपेन्द्र-मृगराज-दवानलाहि- संग्राम-वारिधि-महोदर-बंधनोत्थम्। तस्याशु नाशमुपयाति भयं भियेव यस्तावकं स्तवमिमं मतिमानधीते॥43॥


मत्त गजेन्द्र, मृगराज, दावानल, सर्प, संग्राम, समुद्र, महोदर तथा बन्धन से उत्पन्न भय — जो बुद्धिमान् आपके इस स्तवन को पढ़ता है, उसका वह भय मानो स्वयं भयभीत होकर शीघ्र नाश को प्राप्त होता है।

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