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श्लोक 42

42

आपाद-कण्ठमुरु-शृङ्खल-वेष्टिताङ्गा गाढं बृहन्-निगड-कोटि-निघृष्ट-जङ्घाः । त्वन्नाम-मन्त्रमनिशं मनुजाः स्मरन्तः सद्यः स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति ॥४६॥


पैर से कण्ठ तक भारी शृंखलाओं से वेष्टित अंग वाले, बड़ी बेड़ियों की कोटियों से घिसी हुई जंघाओं वाले मनुष्य भी आपके नाम-मन्त्र का निरन्तर स्मरण करते हुए तत्काल स्वयं बन्धन के भय से रहित हो जाते हैं।

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