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श्लोक 41

41

उद्भूत-भीषण-जलोदर-भार-भुग्नाः शोच्यां दशामुपगताश्च्युत-जीविताशाः । त्वत्पाद-पङ्कज-रजोऽमृत-दिग्ध-देहा मर्त्या भवन्ति मकर-ध्वज-तुल्य-रूपाः ॥४५॥


उत्पन्न हुए भीषण जलोदर के भार से झुके हुए, शोचनीय दशा को प्राप्त, जीवन की आशा से च्युत मनुष्य भी आपके चरण-कमलों की रज रूपी अमृत से देह के लिप्त होने पर कामदेव के समान रूप वाले हो जाते हैं।

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