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श्लोक 44

44

स्तोत्र-स्रजं तव जिनेन्द्र! गुणैर्निबद्धां भक्त्या मया विविध-वर्ण-विचित्र-पुष्पाम् । धत्ते जनो य इह कण्ठ-गतामजस्रं तं मानतुङ्गमवशा समुपैति लक्ष्मीः ॥४८॥


हे जिनेन्द्र! आपके गुणों से गूँथी हुई, मेरे द्वारा भक्ति से विविध वर्णों के विचित्र पुष्पों वाली इस स्तोत्र-माला को जो मनुष्य निरन्तर कण्ठ में धारण करता है, उस मानतुङ्ग को लक्ष्मी स्वयं वशीभूत होकर प्राप्त होती है।

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