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श्लोक 39

कुन्ताग्रभिन्न - गजशोणित - वारिवाह- वेगावतार-तरणातुरयोध-भीमे। युद्धे जयं विजितदुर्जयजेयपक्षाः त्वत्पाद-पंकजवनाश्रयिणो लभन्ते॥39॥


भालों के अग्र-भाग से भिन्न हुए हाथियों के रक्त रूपी जल-प्रवाह के वेग में उतरकर तैरने को आतुर योद्धाओं से भीषण युद्ध में, आपके चरण-कमल-वन का आश्रय लेने वाले दुर्जय पक्ष को जीतकर जय प्राप्त करते हैं।

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