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विघ्न-निवारण — भक्तामर पाठ

परंपरा में बाधा और अवरोध के समय इन पाठों का वाचन बताया गया है।

विघ्न-निवारण का प्रसंग

भक्तामर स्तोत्र की रचना की जो कथा परंपरा में प्रचलित है, वह स्वयं विघ्न से मुक्ति की कथा है। कहा जाता है कि आचार्य मानतुंग बंदीगृह में थे और शृंखलाओं से बँधे थे; उन्होंने आदिनाथ की स्तुति में यह स्तोत्र रचा, और एक-एक श्लोक के साथ एक-एक बंधन टूटता गया। इसी कारण पूरे स्तोत्र को परंपरा में बाधा-निवारण से जोड़कर देखा जाता है।

यहाँ जो श्लोक संकलित हैं, वे वे हैं जिनमें अवरोध, संकट और रुकावट का उल्लेख सीधे आता है — जहाँ स्तुति का स्वर ही यह है कि प्रभु का स्मरण करने वाले के मार्ग की बाधाएँ शिथिल हो जाती हैं।

इनका चयन कैसे हुआ

चयन का आधार श्लोकों का अपना विषय है, कोई बाहरी सूची नहीं। जिन श्लोकों में बंधन, भय, संकट अथवा अवरोध का प्रसंग आता है, वे यहाँ एक साथ रखे गए हैं, ताकि किसी विशेष स्थिति में पाठ करने वाले को पूरा स्तोत्र खोजना न पड़े।

पूरा पाठ अथवा यह चयन

ध्यान देने योग्य है कि परंपरा विघ्न-निवारण को बाहरी बाधा हटने भर के अर्थ में नहीं लेती। जैन दृष्टि में सबसे बड़ा विघ्न कर्म का आवरण है, और स्तुति का प्रयोजन उसी आवरण को शिथिल करना कहा गया है — बाहर की सुविधा उसका परिणाम हो सकती है, प्रयोजन नहीं।

यह ध्यान रखने योग्य है कि भक्तामर एक सम्पूर्ण रचना है, चौवालीस श्लोकों की एक अखंड स्तुति। उसे प्रसंग के अनुसार बाँटना परंपरा की पद्धति नहीं, पाठक की सुविधा है। जिसे समय मिले, वह पूरा स्तोत्र पढ़े — परंपरा में यही मुख्य विधान है।

यह विभाजन उनके लिए है जो किसी विशेष स्थिति में हैं और थोड़े समय में कुछ श्लोकों का पाठ करना चाहते हैं। ऐसे में यह जानना उपयोगी है कि किन श्लोकों में उस स्थिति का प्रसंग सीधे आता है।

नीचे दी गई सूची से प्रत्येक श्लोक के अपने पृष्ठ पर पहुँचा जा सकता है, जहाँ मूल संस्कृत, लिप्यंतरण, हिंदी अर्थ और शब्द-दर-शब्द अर्थ दिए गए हैं। बंधन-मुक्ति की जो कथा ऊपर कही गई, उसके श्लोक वहीं पूरे रूप में मिलेंगे।

18 श्लोक

पाठ की विधि

परंपरा में प्रातःकाल स्नान के पश्चात्, स्वच्छ आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके पाठ करने का विधान बताया गया है। पाठ से पूर्व णमोकार महामंत्र का स्मरण किया जाता है।

श्लोक का उच्चारण स्पष्ट और अविचल गति से किया जाए, और अर्थ का भी मनन साथ चले — परंपरा में अर्थ-सहित पाठ को अधिक फलदायी माना गया है। संख्या का कोई बंधन अनिवार्य नहीं है; नियमितता को महत्त्व दिया गया है।