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श्लोक 6

अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहासधाम, त्वद्भक्तिरेव मुखरीकुरुते बलान्माम्। यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति, तच्चारु - चाम्र - कलिका - निकरैकहेतुः॥6॥


अल्प-श्रुत तथा विद्वानों के उपहास का पात्र होते हुए भी आपकी भक्ति ही मुझे बलपूर्वक मुखर करती है। वसन्त में कोयल जो मधुर बोलती है, उसका एकमात्र कारण आम की सुन्दर मंजरियों का समूह ही है।

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