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श्लोक 4

वक्तुं गुणान् गुणसमुद्र! शशांककांतान्, कस्ते क्षमः सुरगुरुप्रतिमोऽपि बुद्धया। कल्पान्त - काल - पवनोद्धत - नक्रचक्रं, को वा तरीतुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम्॥4॥


हे गुणों के समुद्र! चन्द्रमा के समान कान्त आपके गुणों को कहने में बृहस्पति के समान बुद्धिमान् भी कौन समर्थ है? प्रलय-काल की वायु से उठे हुए मगरमच्छों के समूह वाले समुद्र को भुजाओं से कौन तैर सकता है?

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