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श्लोक 3

3

बुद्ध्या विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत-त्रपोऽहम् । बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब- मन्यः क इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम् ॥३॥


हे देवताओं द्वारा पूजित पाद-पीठ वाले! बुद्धि के बिना भी स्तुति करने को उद्यत मैं निर्लज्ज हूँ। बालक को छोड़कर और कौन मनुष्य जल में प्रतिबिम्बित चन्द्र-बिम्ब को सहसा पकड़ना चाहेगा?

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शब्दार्थ

विबुध = देवता · अर्चित = पूजित · पाद-पीठ = चरण रखने की चौकी · विगत-त्रप = लज्जा-रहित · जल-संस्थित = जल में स्थित · इंदु-बिंब = चंद्रमा का प्रतिबिंब