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श्लोक 1

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भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा- मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम् । सम्यक् प्रणम्य जिन-पाद-युगं युगादा- वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम् ॥१॥


भक्ति से नमे हुए देवताओं के मुकुटों की मणियों की प्रभा को उद्योतित करने वाले, पाप रूपी अंधकार के समूह को नष्ट करने वाले, तथा युग के आदि में भव-सागर में डूबते हुए जीवों के आलम्बन-स्वरूप जिनेन्द्र के चरण-युगल को भली भाँति प्रणाम करके —

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शब्दार्थ

भक्तामर = भक्त देवता · प्रणत-मौलि = झुके हुए मस्तक · मणि-प्रभा = मणियों की कांति · दलित = नष्ट किया हुआ · तमो-वितान = अंधकार का विस्तार · भव-जल = संसार-सागर