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पारिवारिक संबंध — भक्तामर पाठ

परंपरा में गृह-शांति, सद्भाव और संतान-प्राप्ति हेतु इन पाठों का वाचन बताया गया है।

पारिवारिक संबंध का प्रसंग

जैन परंपरा में पारिवारिक कलह का मूल कषाय में देखा गया है — क्रोध, मान, माया और लोभ। संबंध बाहर से नहीं सुधरते; कषाय की तीव्रता घटे तो व्यवहार स्वयं बदलता है। यही कारण है कि क्षमापना को परंपरा में इतना केंद्रीय स्थान मिला है।

संवत्सरी के दिन "मिच्छामि दुक्कडम्" कहकर क्षमा माँगना और देना इसी का वार्षिक रूप है, और परंपरा कहती है कि जिससे बैर हो, उससे स्वयं जाकर क्षमा माँगी जाए।

इनका चयन कैसे हुआ

यहाँ वे श्लोक हैं जिनमें शरण, आश्रय अथवा सौम्यता का भाव प्रमुख है — जहाँ स्तुति का स्वर कोमल है और वैर के स्थान पर समर्पण का भाव आता है।

परिवार में सामूहिक पाठ की परंपरा भी रही है; साथ बैठकर पाठ करना स्वयं एक निकटता का अभ्यास है।

सामूहिक पाठ की परंपरा

घर में साथ बैठकर पाठ करने की परंपरा का एक व्यावहारिक पक्ष भी है — बच्चों तक स्वर, लय और अर्थ इसी तरह पहुँचते रहे हैं। जो पाठ घर में नियमित सुना जाता है, वह पीढ़ी के साथ आगे चलता है।

सामूहिक पाठ में प्रायः पूरा स्तोत्र पढ़ा जाता है। यह चयन उन दिनों के लिए है जब समय कम हो, अथवा जब किसी विशेष भाव से बैठना हो।

नीचे प्रत्येक श्लोक अपने पूरे पृष्ठ से जुड़ा है, जिसमें अर्थ भी साथ है। सामूहिक पाठ में अर्थ का वाचन भी किया जाए तो छोटों के लिए वह अधिक ग्राह्य होता है।

बैठने का क्रम भी सहज रखा जाए — जो पाठ कर सके वह पढ़े, शेष सुनें। स्वर एक साथ उठे, यह आवश्यक नहीं; सुनना भी पाठ में सम्मिलित होना ही है, और बच्चों के लिए प्रायः यही पहला परिचय बनता है।

8 श्लोक

पाठ की विधि

परंपरा में परिवार के साथ बैठकर, सायंकाल पाठ करने का उल्लेख मिलता है। पाठ के पश्चात् क्षमापना का भाव रखना उचित बताया गया है।

यह भी कहा गया है कि पाठ के साथ व्यवहार का सुधार आवश्यक है — केवल वाचन से संबंध नहीं बदलते।