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श्लोक 32

32

उन्निद्र-हेम-नव-पङ्कज-पुञ्ज-कान्ती पर्युल्लसन्-नख-मयूख-शिखाभिरामौ । पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र! धत्तः पद्मानि तत्र विबुधाः परिकल्पयन्ति ॥३६॥


हे जिनेन्द्र! विकसित स्वर्ण-कमलों के समूह की कान्ति वाले, चारों ओर उल्लसित नख-किरणों की शिखाओं से अभिराम आपके चरण जहाँ पद रखते हैं, वहाँ देवगण कमलों की रचना कर देते हैं।

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