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श्लोक 33

इत्थं यथा तव विभूतिरभूज्जिनेन्द्र! धर्मोपदेशनविधौ न तथा परस्य। यादृक् प्रभा दिनकृतः प्रहतान्धकारा तादृक् कुतो ग्रह-गणस्य विकाशिनोऽपि॥33॥


हे जिनेन्द्र! धर्मोपदेश की विधि में जैसी विभूति आपकी हुई, वैसी दूसरे की नहीं। अन्धकार को नष्ट करने वाली जैसी प्रभा सूर्य की है, वैसी विकासशील ग्रह-गणों की कहाँ से हो?

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