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श्लोक 37

रक्तेक्षणं समदकोकिल-कण्ठनीलं क्रोधोद्धतं फणिनमुत्फणमापतन्तम्। आक्रामति क्रमयुगेन निरस्तशंक- स्त्वन्नामनागदमनी हृदि यस्य पुंसः॥37॥


लाल नेत्रों वाले, मदमत्त कोयल के कण्ठ के समान नीले, क्रोध से उद्धत, फण उठाए सामने आते हुए सर्प को — जिस पुरुष के हृदय में आपका नाम रूपी नागदमनी है — वह निःशंक होकर चरणों से लाँघ जाता है।

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