मुख्य सामग्री पर जाएँ

श्लोक 36

कल्पान्तकाल-पवनोद्धत-वह्निकल्पं दावानलं ज्वलितमुज्ज्वलमुत्स्फुलिंगम्। विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुखमापतन्तं त्वन्नामकीर्तनजलं शमयत्यशेषम्॥36॥


प्रलय-काल की वायु से उद्धत अग्नि के समान, प्रज्वलित, उज्ज्वल, चिंगारियों वाला, मानो विश्व को निगलने को सम्मुख आता हुआ दावानल — आपके नाम-कीर्तन रूपी जल से समूल शान्त हो जाता है।

सुनें