मुख्य सामग्री पर जाएँ
‹ चौबीस तीर्थंकर
4चतुर्थ तीर्थंकर

भगवान अभिनंदननाथ

Abhinandannath

अभिनंदन स्वामी
चिन्हवानर
वर्णस्वर्ण

परिवार एवं संघ

पिता
संवर
माता
सिद्धार्था
जन्म नगरी
अयोध्या
वंश
इक्ष्वाकुवंश
यक्ष
यक्षेश्वर (ईश्वर)
यक्षिणी
कालिका
गणधर
116
चैत्य वृक्ष
प्रियंगु

निर्वाण स्थल

सम्मेद शिखर

परंपरा के अनुसार यहीं अभिनंदननाथ ने निर्वाण प्राप्त किया।

नक्शे पर देखें ↗

स्तुति

नाम-मंत्र

ॐ ह्रीं श्री अभिनन्दननाथाय नमः ।

अभिनंदण वांदू नित्य मनरली । तीर्थंकर हो चोथा जग भाण, छांड गृहवास करी मति निरमली । विषय-विटंबण हो तजिया विष फल जाण, अभिनंदण वांदू नित्य मनरली ।। १ ।।

प्रभो ! तुम चौथे तीर्थंकर हो । इस जगत् में सूर्य हो । तुमने गृहवास को त्याग अपनी मति को निर्मल बना लिया । तुमने विषय-प्रपंच को विष-फल समझकर त्याग दिया ।

पूरी चौबीसी पढ़ें (7 गाथा) ›

स्रोत — कल्पसूत्र · त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित (श्वेतांबर परम्परा)