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‹ चौबीस तीर्थंकर
4चतुर्थ तीर्थंकर

भगवान अभिनंदननाथ

Abhinandannath

अभिनंदन स्वामी
चिन्हवानर
वर्णस्वर्ण

परिवार एवं संघ

पिता
संवर
पिता की गति
दूसरे देवलोक ईशान में
माता
सिद्धार्था
माता की गति
सिद्ध
जन्म नगरी
अयोध्या
वंश
इक्ष्वाकुवंश
यक्ष
यक्षेश्वर (ईश्वर)
यक्षिणी
कालिका
गणधर
116
चैत्य वृक्ष
प्रियंगु

जीवन की तिथियाँ

जन्म तिथि
माघ शु. 2
नक्षत्र
अभिजित
दीक्षा तिथि
माघ शु. 12
दीक्षा साथी
1000
केवलज्ञान तिथि
पौष शु. 14
छद्मस्थ काल
18 वर्ष

चिह्न, शरीर और आयु

लक्षण चिह्न
वानर
शरीर मान
350 धनुष
साधक जीवन
1 लाख पूर्व 8 पुर्वांगकम
आयुमान
50 लाख पूर्व

निर्वाण स्थल

सम्मेद शिखर

निर्वाण तिथि
बैशाख शु. 8
निर्वाण साथी
1,000
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स्तुति

नाम-मंत्र

ॐ ह्रीं श्री अभिनन्दननाथाय नमः ।

अभिनंदण वांदू नित्य मनरली । तीर्थंकर हो चोथा जग भाण, छांड गृहवास करी मति निरमली । विषय-विटंबण हो तजिया विष फल जाण, अभिनंदण वांदू नित्य मनरली ।। १ ।।

प्रभो ! तुम चौथे तीर्थंकर हो । इस जगत् में सूर्य हो । तुमने गृहवास को त्याग अपनी मति को निर्मल बना लिया । तुमने विषय-प्रपंच को विष-फल समझकर त्याग दिया ।

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स्रोत — कल्पसूत्र · त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित (श्वेतांबर परम्परा)