4चतुर्थ तीर्थंकर
भगवान अभिनंदननाथ
Abhinandannath
वानर
स्वर्ण
परिवार एवं संघ
- संवर
- दूसरे देवलोक ईशान में
- सिद्धार्था
- सिद्ध
- अयोध्या
- इक्ष्वाकुवंश
- यक्षेश्वर (ईश्वर)
- कालिका
- 116
- प्रियंगु
जीवन की तिथियाँ
- माघ शु. 2
- अभिजित
- माघ शु. 12
- 1000
- पौष शु. 14
- 18 वर्ष
चिह्न, शरीर और आयु
- वानर
- 350 धनुष
- 1 लाख पूर्व 8 पुर्वांगकम
- 50 लाख पूर्व
निर्वाण स्थल
सम्मेद शिखर
- बैशाख शु. 8
- 1,000
स्तुति
ॐ ह्रीं श्री अभिनन्दननाथाय नमः ।
अभिनंदण वांदू नित्य मनरली । तीर्थंकर हो चोथा जग भाण, छांड गृहवास करी मति निरमली । विषय-विटंबण हो तजिया विष फल जाण, अभिनंदण वांदू नित्य मनरली ।। १ ।।
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