अभिनंदण वांदू नित्य मनरली । तीर्थंकर हो चोथा जग भाण, छांड गृहवास करी मति निरमली । विषय-विटंबण हो तजिया विष फल जाण, अभिनंदण वांदू नित्य मनरली ।। १ ।।
प्रभो ! तुम चौथे तीर्थंकर हो । इस जगत् में सूर्य हो । तुमने गृहवास को त्याग अपनी मति को निर्मल बना लिया । तुमने विषय-प्रपंच को विष-फल समझकर त्याग दिया ।