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तेरापंथ और लाडनूं का इतिहास

अद्यतन : अगस्त २०२६

लाडनूं राजस्थान का एक प्राचीन एवं ऐतिहासिक नगर है, जो थली-प्रदेश, मारवाड़ और शेखावटी की सीमाओं के मिलन-स्थल पर बसा है। डीडवाना-कुचामन जिले के उत्तर-पूर्वी छोर पर स्थित यह नगर जोधपुर-दिल्ली रेल-मार्ग पर पड़ता है। इसके अस्तित्व के संकेत महाभारत-काल तक जाते हैं। समय-समय पर इस पर भिन्न-भिन्न वंशों का अधिकार रहा — शिशुपाल-वंशी डाहलिया पंवारों और बाद में बागड़ियों के अधिपत्य में यह 'चंदेरी नगरी' कहलाता था, और आगे चलकर इसका नाम हेमावास, हेवास होते हुए 'लाडनूं' हुआ।

प्राचीन नगर की धरोहरें

लाडनूं की प्राचीनता के प्रमाण इतिहास के अनेक पृष्ठों में बिखरे हैं। सम्राट अशोक के काल में यहाँ एक बौद्ध मठ की स्थापना का उल्लेख मिलता है। विशेष रूप से यह नगर जैन धर्म की तपोभूमि रहा है, जहाँ दिगम्बर और श्वेताम्बर — दोनों परम्पराओं की गहरी उपस्थिति और वर्चस्व रहा। मान्यता है कि सम्राट अशोक के प्रपौत्र सम्प्रति ने यहाँ एक विशाल जैन मंदिर बनवाया था, जिसके भग्नावशेष आज भी वर्तमान दिगम्बर बृहद् जैन मंदिर के गर्भगृह में विद्यमान हैं। ग्यारहवीं शताब्दी की विश्व-स्तर पर चर्चित एक सरस्वती-प्रतिमा भी इस नगर के इतिहास की एक अमूल्य धरोहर है।

तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी

युगप्रधान आचार्यश्री तुलसी की जन्मभूमि होने के साथ लाडनूं को तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। लगभग एक लाख की आबादी वाले इस नगर की गोद में शिक्षा, शोध, साधना, सेवा, साहित्य और संस्कृति को समर्पित अनेक संस्थाएँ पल्लवित हुई हैं। शिक्षा, शोध, साधना, सेवा, साहित्य एवं संस्कृति — इन सात सकारात्मक योजनाओं के साथ युगीन अपेक्षाओं के अनुरूप यहाँ विविध-आयामी प्रवृत्तियाँ अनवरत गतिशील रहती हैं। प्रेक्षाध्यान, साहित्य-सृजन, प्राकृतिक चिकित्सा (नेचुरोपैथी) एवं आयुर्वेदिक रसायन-शाला के माध्यम से साधना, सेवा और स्वास्थ्य की दिशा में अनेक आयाम सुव्यवस्थित रूप से गतिमान हैं। यहाँ अधिकतम प्रतियों वाला वर्धमान ग्रंथागार (ज्ञान-सम्पदा) श्रुतज्ञान की एक महान धरोहर है।

लाडनूं — तेरापंथ की राजधानी क्यों?

लाडनूं तेरापंथ धर्मसंघ की तपोभूमि, साधना-भूमि और तीर्थभूमि के रूप में इतिहास-विश्रुत है। धर्मसंघ के अनेक कालजयी पृष्ठों का आलेखन इसी पुण्यभूमि पर हुआ है। इसकी विशिष्टता को दर्शाने वाले प्रमुख अभिलेख इस प्रकार हैं—

  • तेरापंथ के आद्य प्रवर्तक आचार्यश्री भिक्षु के चरण-स्पर्श से पावन भूमि।
  • जयाचार्य ने यहाँ सेवा-केन्द्र की स्थापना की, जहाँ लगभग १५५ वर्षों से वृद्ध साध्वियों का स्थिरवास-केन्द्र गतिमान है; श्रीमज्जयाचार्य ने लाडनूं को तेरापंथ के विशिष्ट क्षेत्र के रूप में प्रतिष्ठित किया।
  • तेरापंथ के आचार्यों के यहाँ ३०वाँ चातुर्मास (योगक्षेम वर्ष) चल रहा है, साथ ही २५ मर्यादा-महोत्सव सम्पन्न हुए।
  • तेरापंथ के दस आचार्यों का पदार्पण इस नगरी में हुआ।
  • तेरापंथ साधु-समाज द्वारा सप्तमाचार्य डालगणी का निर्वाचन यहीं हुआ।
  • यह दो आचार्यों — आचार्य डालगणी और कालूगणी — की आचार्य-पदारोहण भूमि है।
  • आचार्य डालगणी और आचार्य महाप्रज्ञ ने यहीं अपने उत्तराधिकारी-पत्र का आलेखन किया।
  • आचार्य महाप्रज्ञ द्वारा अपने गुरु आचार्य तुलसी को अपने उत्तराधिकारी (युवाचार्य महाश्रमण) का मनोनयन-पत्र यहीं समर्पित किया गया।
  • युगप्रधान आचार्यश्री तुलसी की जन्मभूमि होने का गौरव।
  • तीन साध्वीप्रमुखाओं (साध्वीप्रमुखा लाडांजी, कनकप्रभाजी एवं विश्रुतविभाजी) की मातृभूमि।
  • तीन आचार्यों (आचार्य मघराजजी, माणकलालजी और तुलसी) की दीक्षा-भूमि।
  • आचार्य तुलसी द्वारा धर्मसंघ में नई व्यवस्था का सूत्रपात एवं मुनि मुदितकुमार को 'महाश्रमण' और साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा को 'महाश्रमणी' पद पर नियुक्त किया जाना।
  • आचार्य तुलसी के ७५वें वर्ष के अवसर पर योगक्षेम प्रशिक्षण-वर्ष का आयोजन, जिसमें ८४ संत और २९२ साध्वियों की उपस्थिति रही।
  • तपस्या एवं अनशन के अनेक कीर्तिमान इस भूमि पर स्थापित हुए।
  • समणी श्रेणी का सूत्रपात यहीं हुआ।
  • सप्तमाचार्य डालगणी, सेवाभावी मुनिश्री चंपालालजी, आचार्यश्री महाप्रज्ञजी की संसारपक्षीय भगिनी साध्वी मालूजी एवं दीर्घ-तपस्विनी साध्वी पन्नाजी के भव्य स्मारक यहाँ स्थित हैं।
  • श्रावक सुमेरमलजी का १२१ प्रहरी पौषध यहीं सम्पन्न हुआ।
  • शिक्षा, सेवा, शोध, समन्वय, साधना, साहित्य एवं संस्कृति को समर्पित संस्थाओं का केन्द्र।
  • विश्व का प्रथम जैन विश्वविद्यालय यहीं स्थित है।
  • मुमुक्षु एवं उपासिका बहिनों के शिक्षण-प्रशिक्षण का केन्द्र 'पारमार्थिक शिक्षण संस्था' यहीं है।
  • साध्वीप्रमुखा कनकप्रभाजी के साध्वीप्रमुखा-पद के ५०वें वर्ष के उपलक्ष्य में अमृतमहोत्सव का आयोजन एवं आचार्यश्री महाश्रमण द्वारा शासनमाता का संबोधन-स्थल।
  • परम श्रद्धेय आचार्यश्री महाश्रमणजी द्वारा 'तेरापंथ की राजधानी' के रूप में स्वीकृत।