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‹ चौबीस तीर्थंकर
1प्रथम तीर्थंकर

भगवान ऋषभदेव

Rishabhdev

ऋषभनाथआदिनाथ
चिन्हवृषभ
वर्णस्वर्ण

परिवार एवं संघ

पिता
नाभिराय
माता
मरुदेवी
जन्म नगरी
अयोध्या
वंश
इक्ष्वाकुवंश
यक्ष
गोमुख
यक्षिणी
चक्रेश्वरी
गणधर
84
चैत्य वृक्ष
न्यग्रोध (वट)

निर्वाण स्थल

अष्टापद

परंपरा के अनुसार यहीं ऋषभदेव ने निर्वाण प्राप्त किया।

नक्शे पर देखें ↗

स्तुति

नाम-मंत्र

ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नमः ।

प्रणमूं प्रथम जिनन्द नैं जय जय जिन चंदा ।। वन्दु बेकर जोड़ नैं, जुग आदि जिनिन्दा । कर्म-रिपु-गज ऊपरै, मृगराज मुनिन्दा ।। १ ।।

मैं इस युग के आदि अर्हत् ऋषभदेव को बद्धाञ्जलि होकर वंदना करता हूं । हे मुनीन्द्र ! कर्मशत्रु रूप हाथी को आहत करने के लिए तुम सिंह के समान हो ।

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भक्तामर स्तोत्र

आचार्य मानतुंग की यह स्तुति प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को समर्पित है — कुल चौवालीस श्लोक।

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स्रोत — कल्पसूत्र · त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित (श्वेतांबर परम्परा)