1प्रणमूं प्रथम जिनन्द नैं जय जय जिन चंदा ।। वन्दु बेकर जोड़ नैं, जुग आदि जिनिन्दा । कर्म-रिपु-गज ऊपरै, मृगराज मुनिन्दा ।। १ ।।
मैं इस युग के आदि अर्हत् ऋषभदेव को बद्धाञ्जलि होकर वंदना करता हूं । हे मुनीन्द्र ! कर्मशत्रु रूप हाथी को आहत करने के लिए तुम सिंह के समान हो ।
2अनुकूल प्रतिकूल सम सही, तप विविध तपंदा । चेतन तन भिन लेखवी, ध्यान शुकल ध्यावंदा ।। २ ।।
तुमने अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों को समभाव से सहन कर विविध प्रकार का तप तपा । भेद विज्ञान के द्वारा आत्मा और शरीर को भिन्न समझकर तुम शुक्लध्यान में लीन हो गये ।
3पुद्गल-सुख अरि पेखिया, दुख-हेतु भयाला । विरक्त चित विघट्यो इसो, जाण्या प्रत्यक्ष जाला ।। ३ ।।
तुमने देखा—यह पौद्गलिक सुख अहितकर, दुःखहेतु और भय पैदा करने वाला है । उसे प्रत्यक्ष पाश के रूप में समझकर तुम्हारा विरक्त चित्त उससे विलग हो गया ।
4संवेग-सरवर झुलता, उपशम-रस लीना । निंदा-स्तुति सुख-दुःख में, समभाव सुचीना ।। ४ ।।
तुम संवेग रूप सरोवर के शांतरस रूप जल में तल्लीन होकर डुबकियां लगाते रहे । निन्दा-स्तुति और सुखदुःख—इन द्वन्द्वों में सम रहना ही साधना का पथ है । इस तथ्य को तुमने भली भांति समझ लिया ।
5वासी चंदन समपणैं, थिर-चित्त जिन ध्याया । इम तन-सार तजी करी, प्रभु केवल पाया ।। ५ ।।
तुम बसौले से काटने और चंदन से चर्चित करने पर समचित्त रहे । तुमने स्थिर-चित्त होकर ध्यान किया । इस प्रकार देहाध्यास को छोड़तुम केवली बन गये ।
6हूं बलिहारी तांहरी वाह ! वाह ! ! जिनराया । उवा दिशा किण दिन आवसी, मुझ मन ऊम्हाया ।। ६ ।।
हे जिनेश्वर ! मैं तुम्हारे लिए उपहृत हूं । उस स्थिति को मैं किस दिन प्राप्त कर सकूंगा ? मेरा मन उतावला हो रहा है । अर्हत् ऋषभ ! तुम्हारी स्तुति करने से मुझे अपार हर्ष हुआ ।
7उगणीसै सुदि भाद्रवै, दशमी दीतवारं । ऋषभदेव रटवै करी, हुओ हरष अपारं ।। ७ ।।
हे जिनेश्वर ! मैं तुम्हारे लिए उपहृत हूं । उस स्थिति को मैं किस दिन प्राप्त कर सकूंगा ? मेरा मन उतावला हो रहा है । अर्हत् ऋषभ ! तुम्हारी स्तुति करने से मुझे अपार हर्ष हुआ ।