प्रणमूं प्रथम जिनन्द नैं जय जय जिन चंदा ।। वन्दु बेकर जोड़ नैं, जुग आदि जिनिन्दा । कर्म-रिपु-गज ऊपरै, मृगराज मुनिन्दा ।। १ ।।
मैं इस युग के आदि अर्हत् ऋषभदेव को बद्धाञ्जलि होकर वंदना करता हूं । हे मुनीन्द्र ! कर्मशत्रु रूप हाथी को आहत करने के लिए तुम सिंह के समान हो ।