1सूरत थांरी मन बसै साहिब जी ! शीतल जिन शिवदायका साहिब जी ! शीतल चन्द समान हो, निसनेही । शीतल अमृत सारिषा साहिब जी ! तप्त मिटै तुम ध्यान हो, निसनेही ।। १ ।।
शीतल प्रभो ! तुम शिवदायक और चांद के समान शीतल हो । तुम अमृत-तुल्य हो । तुम्हारे ध्यान से ताप-संताप मिट जाता है ।
2वंदै निंदै तो भणी साहिब जी ! राग द्वेष नहीं ताम हो, निसनेही । मोह दावानल मेटियो साहिब जी ! गुण-निप्पन तुम नाम हो, निसनेही ।। २ ।।
प्रभो ! कोई तुम्हारी वंदना करता है, कोई निन्दा । न वंदना करने वाले पर राग और न निन्दा करने वाले पर द्वेष । तुमने मोह दावानल को शीतल कर दिया, अतः तुम्हारा यह ‘शीतल’ नाम गुण-निष्पन्न है ।
3नृत्य करै तुझ आगलै साहिब जी ! इंद्राणी सुर-नार हो, निसनेही । राग भाव नहिं ऊपजै साहिब जी ! अंतर तप्त निवार हो, निसनेही ।। ३ ।।
प्रभो ! तुम्हारे सामने इन्द्राणी और अप्सराएं नृत्य करती हैं, फिर भी तुम्हारे मन में रागात्मक भाव उत्पन्न नहीं होते, क्योंकि तुमने अन्तस् ताप का निवारण कर दिया है ।
4क्रोध मान माया लोभ ए साहिब जी ! अग्नि सूं अधिकी आग हो, निसनेही । शुकल ध्यान रूप जल करी साहिब जी ! थया शीतलीभूत महाभाग हो, निसनेही ।। ४ ।।
प्रभो ! क्रोध, मान, माया और लोभ—यह कषाय-चतुष्क अग्नि से अधिक तीव्र आग है । तुमने शुक्ल ध्यान रूपी जल के द्वारा उसे बुझा दिया । फलतः तुम शीतलीभूत हो गये ।
5इन्द्रिय नोइन्द्रिय आकरा साहिब जी ! दुर्जय नैं दुर्दांत हो, निसनेही । तैं जीत्या मन थिर करी साहिब जी ! धर उपशम चित शांत हो, निसनेही ।। ५ ।।
प्रभो ! इन्द्रियां और मन प्रचण्ड, दुर्जय और दुर्दान्त हैं । तुमने मन को स्थिर कर उन्हें जीत लिया और उपशम भाव धारण कर चित्त को शान्त कर लिया ।
6अंतरजामी ! आपरो साहिब जी ! ध्यान धरूं दिन-रैन हो, निसनेही । उवाही दशा कद आवसी साहिब जी ! होसी उत्कृष्टो चैन हो, निसनेही ।। ६ ।।
अन्तर्यामिन् ! मैं दिन-रात तुम्हारा ध्यान करता हूं । वह वीतराग दशा कब आयेगी ? उसके आने पर उत्कृष्ट आनन्द का अनुभव होगा ।
7उगणीसै पूनम भाद्रवी साहिब जी ! शीतल मिलवा काज हो, निसनेही । शीतल जिनजी नैं समरिया साहिब जी ! हिय शीतल हुवो आज हो, निसनेही ।। ७ ।।
प्रभो ! तुमसे साक्षात्कार करने के लिए मैंने तुम्हारा सुमिरन किया । इससे आज मेरा हृदय शीतल हो गया ।