सूरत थांरी मन बसै साहिब जी ! शीतल जिन शिवदायका साहिब जी ! शीतल चन्द समान हो, निसनेही । शीतल अमृत सारिषा साहिब जी ! तप्त मिटै तुम ध्यान हो, निसनेही ।। १ ।।
शीतल प्रभो ! तुम शिवदायक और चांद के समान शीतल हो । तुम अमृत-तुल्य हो । तुम्हारे ध्यान से ताप-संताप मिट जाता है ।