सुविधि भजियै शिरनामी हो । सुविधि करि भजियै सदा, सुविधि जिनेश्वर स्वामी हो । पुष्पदंत नाम दूसरो, प्रभु अंतरयामी हो ।। १ ।।
सुविधि प्रभो ! मैं तुम्हारा सम्यग् विधि से भजन करता हूं । तुम्हारा दूसरा नाम है पुष्पदन्त । तुम अन्तर्यामी हो ।
सुविधि भजियै शिरनामी हो । सुविधि करि भजियै सदा, सुविधि जिनेश्वर स्वामी हो । पुष्पदंत नाम दूसरो, प्रभु अंतरयामी हो ।। १ ।।
सुविधि प्रभो ! मैं तुम्हारा सम्यग् विधि से भजन करता हूं । तुम्हारा दूसरा नाम है पुष्पदन्त । तुम अन्तर्यामी हो ।
श्वेत वरण प्रभु शोभता, वारू वाण अमामी हो । उपशम रस गुण आगली, मेटण भव भव खामी हो ।। २ ।।
प्रभो ! तुम अपने श्वेत वर्ण से सुशोभित हो रहे हो । तुम्हारी उपशम रस से भरी अनुपम वाणी जनम-जनम की खामी मिटाने वाली है ।
समवसरण बिच फाबता, त्रिभुवन-तिलक तमामी हो । इंद्र थकी ओपै घणां, शिव-दायक स्वामी हो ।। ३ ।।
सम्पूर्ण त्रिभुवन में तिलक-रूप तुम समवसरण में सुशोभित हो । हे शिवदायक स्वामी ! तुम इन्द्र से भी अधिक कमनीय हो ।
सुरेंद्र नरेंद्र चंद्र ते, इंद्राणी अभिरामी हो । निरख-निरख धापै नहीं, एहवो रूप अमामी हो ।। ४ ।।
प्रभो ! सुंदरता में अग्रणी सुरेन्द्र, नरेन्द्र, चन्द्र और इन्द्राणी भी तुम्हें देख-देख कर तृप्त नहीं होते हैं, ऐसा अनुपम है तुम्हारा रूप ।
मधुकर मरंद तणी परै, सुर नर कद्र सलामी हौ । तो पिण राग व्यापै नहीं, चीत्यौ मौह इयमी हो ।। ५ ।।
सुविधि प्रभो ! कमल पराग पर मधुकर की भांति देव और मनुष्य प्रणाम की मुद्रा में तुम्हारे पास मंडराते हैं फिर भी तुम में राग व्याप्त नहीं होता, क्योंकि क्लेश पैदा करने वाले मोह को तुमने जीत लिया ।
जे चोधा जग मैं घणां, सिंह साथे संग्रामी हो । तैं मन इन्द्री वश करी, जोड़ी केवल पामी हो ।। ६ ।।
सिंह के साथ संग्राम करने वाले योद्धा इस जगत् में बहुत मिलेंगे । इन्द्रिय और मन को वश में करने वाले योद्धा कम मिलेंगे । तुमने उन्हें वश में कर केवलज्ञान और केवलदर्शन को उपलब्ध कर लिया ।
उगणीसै पूनम भावी, प्रणमूं शिरनामी हो । मन-चिंतित वस्तु मिलै, रटियां बिन स्वामी हो ।। ७ ।।
मैं नतमस्तक हो तुम्हें प्रणाम करता हूं । तुम्हारे नाम-जप से मनचिंतित वस्तु की प्राप्ति होती है ।