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णमोक्कार मंत्र

णमो अरहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूणं।

  1. प्रश्न 1. जैनधर्म में महामंत्र किसको माना गया है?

    जैनधर्म में णमोक्कार मंत्र को महामंत्र माना गया है।

  2. प्रश्न 2. णमोक्कार मंत्र में किसको नमस्कार किया गया है?

    पंच परमेष्ठी को नमस्कार किया गया है। परमेष्ठी किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं, जिनकी साधना सिद्धि तक पहुंच चुकी है अथवा जो साधना पथ पर आरुढ़ हैं, वे परमेष्ठी कहलाते हैं।

  3. प्रश्न 3. नमस्कार महामंत्र में कितने पद एवं अक्षर हैं?

    नमस्कार मंत्र में ५ पद एवं ३५ अक्षर हैं।

  4. प्रश्न 4. नमस्कार मंत्र में कितने अक्षर गुरु और कितने अक्षर लघु हैं एवं कितने अक्षर दीर्घ एवं कितने अक्षर ह्रस्व हैं?

    नमस्कार मंत्र में ११ अक्षर लघु, २४ गुरु, १५ दीर्घ एवं २० हस्व हैं। आचार्यश्री तुलसी ने इसे एक दोहे के रूप में प्रस्तुति दी है— णमोक्कार के पांच पद, अक्षर हैं पैंतीस। ग्यारह लघु चौबीस गुरु, दीर्घ पनर हस बीस।

  5. प्रश्न 5. णमोक्कार मंत्र को महामंत्र क्यों कहा है?

    णमोक्कार मंत्र आत्मजागरण का मंत्र है। अध्यात्म विकास का मंत्र है। भौतिक कामनापूर्ति के लिए अन्य अनेक मंत्रों का जप किया जाता है। णमोक्कार मंत्र कामना पूर्ति का मंत्र नहीं, कामना को समाप्त करने का मंत्र है। इच्छाओं के निरोध का मंत्र है। इच्छाओं से ऊपर उठने वाला व्यक्ति ही आत्मस्वरूप को प्राप्त कर सकता है। इस महामंत्र को सब मंगलों में प्रधान मंगल और सब पापों का नाश करने वाला कहा गया है। यह मंत्र दिगम्बर श्वेताम्बर सभी परंपराओं में समान रूप से मान्य है।

  6. प्रश्न 6. णमोक्कार मंत्र के जप से क्या सब पापों का नाश हो सकता है?

    जैनदर्शन के अनुसार विधिपूर्वक किया गया कोई भी अनुष्ठान सात आठ कर्मों को शिथिल करता है। अनुष्ठान में पूर्ण तल्लीनता की स्थिति में सब कर्मों का विनाश संभव है। भारतीय दर्शन में अज्ञान को सबसे बड़ा पाप माना गया है। आध्यात्मिक मंत्र, शब्द की शक्ति, भावों की तल्लीनता एवं पंच परमेष्ठी के गुणों व आदर्शो की अनुप्रेक्षा, साधक को अज्ञान व पाप से निश्चय ही मुक्ति दिला सकती है।

  7. प्रश्न 7. णमोक्कार मंत्र को सब मंगलों में प्रधान मंगल किस दृष्टि खे कहा गया है?

    इस प्रश्न के सन्दर्भ में हम मंगल, अमंगल को समझें। दशवैकालिक सूत्र में कहा गया है—'धम्मो मंगलमुक्किटट' अर्थात्‌ धर्म सर्वोत्कृष्ट मंगल है। धर्म है आत्मा में रहना। आत्मा से बाहर जाना अधर्म है, अमंगल है। परमेष्ठी मंत्र में किसी व्यक्ति विशेष की आराधना नहीं, भौतिक अभिसिद्धि की कामना नहीं है। यह आत्मा के निकट जाने का मंत्र है। इस दृष्टि से इसको सब मंगलों में प्रधान मंगल कहा गया है।

  8. प्रश्न 8. णमोक्कार मंत्र के जप का क्या उद्देश्य होना चाहिए?

    णमोक्कार मंत्र के जप का उद्देश्य होना चाहिए—मानसिक समता का विकास, आत्मशक्तियों का जागरण, आध्यात्मिक उज्ज्वलता और निर्दिष्ट साधना की पूर्णता।

  9. प्रश्न 9. क्या णमोक्कार मंत्र के जप से भौतिक कामनाएं भी पूर्ण होती हैं?

    कामनाएं पूर्ण न हों ऐसी बात नहीं है, पर भौतिक कामनाओं की पूर्ति इसका मूल उद्देश्य नहीं है। बड़ी उपलब्धि में छोटी उपलब्धि स्वत: समाहित हो जाती है। णमोक्कार मंत्र के साथ कोई मांग जुड़ी हुई नहीं है। जुड़ा हुआ है मात्र चैतन्य का जागरण। जिसकी चेतना का जागरण हो जाता है उसके लिए कुछ भी पाना शेष नहीं बचता।

  10. प्रश्न 10. णमोक्कार मंत्र इतना शक्तिशाली है तो फिर अन्य मंत्रों का जप क्यों किया जाता है?

    अन्य मंत्रों का जप करने से णमोक्कार मंत्र का महत्व कम नहीं होता। प्रश्न है रुचि भेद का जैसे रुचि के आधार पर तपस्या के बारह प्रकार बतलाए गए हैं वैसे ही रुचि भेद के आधार पर मंत्रों का चयन किया जाता है।

  11. प्रश्न 11. णमोक्कार मंत्र में पहला स्थान किसका है?

    अरहंत का।

  12. प्रश्न 12. अरहंत कौन होते हैं?

    जिन्होंने ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अन्तराय—इन चार घनघाती कर्मों को नष्ट करके केवलज्ञान प्राप्त किया है वे अरहंत कहलाते हैं। इन्हें अरिहंत, अर्हत्‌, जिन अथवा तीर्थंकर भी कहते हैं। ये १२ गुणों से युक्त एवं ३४ अतिशयों से सम्पन्न होते हैं।

  13. प्रश्न 13. घनघाती से क्या तात्पर्य है?

    जिन कर्मों से आत्मगुणों का हनन होता है, वे घनघाती कहे जाते हैं।

  14. प्रश्न 14. अरहंत के १२ गुण कौन से हैं?

    १. अनन्त ज्ञान, २. अनन्त दर्शन, ३. अनन्त चारित्र, ४. अनन्त बल, ५. अशोक वृक्ष, ६. पुष्पवृष्टि, ७. दिव्य ध्वनि, ८. देव दुंदुभि, ९. स्फटिक सिंहासन, १०. आभामण्डल, ११. छत्र, १२. चामर। इनमें पहले चार गुण कर्म क्षय जनित व अन्तिम आठ गुण देवकृत हैं। इन्हें प्रातिहार्य भी कहते हैं।

  15. प्रश्न 15. अतिशय शब्द से क्या तात्पर्य है?

    अतिशय अर्थात्‌ विशेषताएं। ऐसी विशेषताएं जो किसी साधारण व्यक्ति में नहीं पाई जातीं।

  16. प्रश्न 16. तीर्थंकर शब्द का क्या अर्थ है?

    तीर्थंकर अर्थात्‌ तीर्थ की स्थापना करनेवाले।

  17. प्रश्न 17. तीर्थ क्या होता है?

    तीर्थ का शाब्दिक अर्थ है जो तरने में सहायक बने। यहां तीर्थ का दो अर्थों में प्रयोग हुआ है—पहला अर्थ है—तीर्थ अर्थात्‌ प्रवचन, दूसरा अर्थ है—तीर्थ अर्थात्‌ साधु, साध्वी, आवक, श्राविका रूप चतुर्विध धर्मसंघ।

  18. प्रश्न 18. क्या केवलज्ञान प्राप्त करने वाले सभी तीर्थंकर कहलाते हैं?

    नहीं, जिन्होंने चार घाती कर्मों का नाश किया है वे सब केवली कहलाते हैं पर तीर्थंकर वे ही बनते हैं जिनके तीर्थंकर नामकर्म की प्रकृति का उदय हो।

  19. प्रश्न 19. 'णमो आरहंताणं' इस पद में केवल तीर्थंकर ही आते हैं या केवली भी आते हैं?

    केवल तीर्थंकर ही। सामान्य केवली पांचवें पद में आते हैं।

  20. प्रश्न 20. तीर्थंकर और सामान्य केवली में क्या अन्तर है?

    तीर्थंकर और सामान्य केवली में कई बातों का अन्तर है। जैसे— १. तीर्थंकर तीर्थ की स्थापना करते हैं, केवली नहीं। २. तीर्थंकर प्रवचन अनिवार्य रूप से करते हैं, केवली के लिए जरूरी नहीं। ३. तीर्थंकर अतिशय सम्पन्न होते हैं, केवली नहीं। ४. तीर्थंकर के चार अघाती कर्मो में एक वेदनीय कर्म को छोड़कर तीन कर्म एकान्त शुभ होते हैं, जबकि केवली के एक आयुष्य कर्म ही ऐकान्तिक शुभ होता है।

  21. प्रश्न 21. तीर्थंकर कृतकृत्य होते हैं। उनके लिए कुछ करणीय शेष नहीं बचता। फिर वे प्रवचन क्यों करते हैं?

    इस जिज्ञासा के समाधान में प्रश्न व्याकरण सूत्र में कहा गया है—'सव्वजगजीवरक्खणदयट्ठयाए पावयणं भगवया सुकहिय'। संसार के सब प्राणियों की रक्षा करने अर्थात्‌ उन्हें पतन से बचाने के लिए तीर्थंकर प्रवचन करते हैं। वे सहज रूप से परम कारुणिक होते हैं। उनकी करुणा में प्राणीमात्र के कल्याण का भाव निहित है। उन्हें साधना से जो प्रकाश मिला है उस प्रकाश से वे जन-जन को प्रकाशित करना चाहते हैं।

  22. प्रश्न 22. अर्हत्‌ की उपासना के लिए कौनसा मंत्र प्रचलित है?

    'अह मंत्र के द्वारा अर्हत्‌ की उपासना की जाती है। 'अर्हं' के अनेक प्रयोग मंत्रशस्त्र में मिलते हैं— प्रथम प्रयोग—अर्हं का पूरे शरीर में न्यास करना। द्वितीय प्रयोग—अर्हं? का कवच निर्मित करना। तृतीय प्रयोग—नाभि पर अहं की स्थापना कर उस पर ध्यान केन्द्रित करना और अह का मृदु उच्चारण करते हुए अनुभव करना—नाभि से अरुण रंग में अर्हं की रश्मियां निकल रही हैं और पूरे शरीर के चारों ओर फैल रही हैं।

  23. प्रश्न 23. तीर्थंकर केवल सिद्धों को ही नमस्कार कयां करते हैं?

    तीर्थंकर कभी किसी के मार्ग का अनुसरण नहीं करते। वे स्वयं मार्ग की खोज करते हैं। उनके सामने कोई अर्त्‌ मार्गदर्शक नहीं होता, इसलिए सिद्धों को नमस्कार करके ही वे अपने मार्ग पर बढ़ते हैं।

  24. प्रश्न 24. अरहंत किस रंग के प्रतीक हैं?

    श्वेत रंग के।

  25. प्रश्न 25. 'णमो अरहंताणं? का ध्यान किस केन्द्र पर किस रंग के साथ किया जाता है?

    ज्ञान केन्द्र पर श्वेत रंग के साथ। श्वेत रंग आन्तरिक शक्तियों को जागृत करनेवाला है।

  26. प्रश्न 26. सिद्ध कौन होते हैं? सिद्ध का स्वरूप क्या है?

    जिन्होंने समस्त कर्मों का नाश कर दिया है वे सिद्ध कहलाते हैं। सिद्ध का स्वरूप है—अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत शक्ति, अनंत आनंद, अजर-अमर, अमूर्त्तं।

  27. प्रश्न 27. सिद्धों के कितने गुण होते हैं?

    आठ कमों के क्षय से सिद्धों में ८ गुण प्रकट होते हैं— १. केवलज्ञान, २. केवलदर्शन, ३. आत्मिक सुख, ४. क्षायिक सम्यक्त्व (वीतरागभाव), ५. अटल-अवगाहना (जन्म-मरण मुक्त), ६. अमूर्ति (अशरीरी), ७. अगुरुलघु (ऊंच-नीच भेदमुक्त), ८. निरन्तराय (अनन्तशक्ति सम्पन्न)।

  28. प्रश्न 28. सिद्धों को किन नामों से पुकारा जाता है?

    सिद्धों के ईश्वर, परमात्मा, परमेश्वर, मुक्तात्मा आदि अनेक नाम हैं।

  29. प्रश्न 29. सिद्धों का निवास कहां है?

    सिद्ध लोक के अन्तिम छोर पर रहते हैं।

  30. प्रश्न 30. सिद्ध जहां रहते हैं उस स्थान का नाम क्या है?

    सिद्धशिला या ईषत प्राग्भारा पृथ्वी है। वह ४५ लाख योजन लम्बी-चौड़ी है। उसका आकार औंधे छत्र की तरह है।

  31. प्रश्न 31. सिद्ध ऊपर लोकान्त में समश्रेणी में ही जाकर स्थित होते हैं या इधर-उधर भी जा सकते हैं?

    सिद्धशिला और मनुष्यलोक दोनों की लम्बाई-चौड़ाई बराबर है। अत: जिस स्थान में सिद्ध होते हैं उसी की समरेखा में सिद्धशिला से ऊपर लोकान्त भाग में वे अवस्थित हो जाते हैं। उनकी गति 'ऋजु'? मानी गई है। अत: इधर-उधर जाने का प्रश्न ही नहीं है।

  32. प्रश्न 32. अर्हतों की अपेक्षा सिद्धों का स्थान उंचा है। फिर पहले अर्हतों को और बाद में सिद्धों को नमस्कार क्यों किया गया?

    यद्यपि कर्मक्षय की दृष्टि से अर्हतों की अपेक्षा सिद्धों का स्थान ऊंचा है। अर्हत् के चार कर्म नष्ट हुए हैं जबकि सिद्ध आठों कर्मों का नाश कर चुके हैं। अर्हत्‌ सशरीरी हैं, जबकि सिद्ध शरीर मुक्त हैं; पर व्यवहार के धरातल पर अर्हत् का प्रथम स्थान उचित है। अर्हत्‌ धर्म के आदिकर हैं। धर्म का स्रोत उन्हीं से निकलता है। उसी स्रोत में अवगाहन कर अनेक व्यक्ति सिद्ध होते हैं। सिद्ध हमारे प्रत्यक्ष नहीं होते, वे अर्हत्‌ के उपदेश से ही जाने जाते हैं। इस दृष्टि से अर्हत्‌ का स्थान पहला रखा है। सन्त कबीर की वाणी से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है। गुरु और भगवान दोनों सामने खड़े हों, उस स्थिति में पहले नमस्कार किसे करना चाहिए? इस प्रश्न के उत्तर में कबीर ने कहा— गुरु गोविन्द दोनों खड़े काके लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपकी, गोविन्द दियो बताय।।

  33. प्रश्न 33. उपरोक्त प्रश्न के संदर्भ में पुन: प्रश्न उभरता है कि वर्तमान में अर्हत्‌ भी हमारे प्रत्यक्ष नहीं हैं। उन्हें हम आचार्य के उपदेश से ही जानते हैं। फिर तो आचार्य का स्थान प्रथम रहना चाहिए?

    निर्युक्तिकार ने इसका समाधान व्यावहारिक उदाहरण से इस प्रकार दिया है—आचार्य अर्हत्‌ की परिषद्‌ होते हैं। कोई भी व्यक्ति परिषद्‌ को प्रणाम कर राजा को प्रणाम नहीं करता। अर्हत्‌ और सिद्ध दोनों की शक्ति समान है। इसलिए उनमें पहले-पीछे का विचार किया जा सकता है किन्तु अर्हत्‌ और आचार्य में पहले-पीछे का विचार नहीं किया जा सकता। आचार्य अर्हत्‌ के ही प्रतिनिधि होते हैं। वे अहत्‌ प्रज्ञप्त धर्म का ही उपदेश करते हैं। उनका मार्ग अर्हतों द्वारा प्रशस्त होता है। वे अर्हतों द्वारा बताए गए मार्ग का ही अनुसरण करते हैं।

  34. प्रश्न 34. अर्हत्‌ की परिणति सिद्ध रूप में होती है। इस दृष्टि से अर्हत्‌ और सिद्ध दोनों को परमेष्ठी माना है। पर आचार्य, उपाध्याय और साधु को परमेष्ठी क्यों कहा गया?

    आचार्य और उपाध्याय अरहतों के प्रतिनिधि होते हैं। अर्हत्‌ की अनुपस्थिति में उनका काम आचार्य और उपाध्याय करते हैं, इसलिए उनको भी परमेष्ठी माना गया है। अब प्रश्न रहा साधु का। इसका सीधा समाधान यही है कि अहत्‌ हो, आचार्य हो या उपाध्याय हो—ये सब पहले साधु हैं बाद में और कुछ। वास्तव में तो साधु ही परमेष्ठी का रूप है। भगवद्गीता की टीका से इस तथ्य की पुष्टि की जा सकती है। उसमें कहा गया है— कान्ता-कांचन-चक्रेषु भ्राम्यते भुवनत्रयम्‌। तासु तेषु विरक्तो य: द्वितीय: परमेश्वर:।। सारा संसार स्त्री और कांचन के चक्र में घूम रहा है। जो व्यक्ति इनसे विरक्त है, वह दूसरा परमेश्वर है।

  35. प्रश्न 35. सिद्ध किस रंग के प्रतीक हैं?

    लाल रंग के।

  36. प्रश्न 36. 'णमो सिद्धाणं' का ध्यान किस केन्द्र पर, किस रंग के साथ किया जाता है?

    दर्शन केन्द्र पर लाल रंग के साथ। लाल रंग आन्तरिक दृष्टि को जागृत करने वाला है। इस रंग में पिच्युटरी ग्लैण्ड और उसके स्रावों को नियंत्रित करने की क्षमता है।

  37. प्रश्न 37. क्या सिद्ध संसार में पुन: आते हैं?

    नहीं, जैसे बीज जल जाने पर पुन: नहीं उगता वैसे ही कर्मबीज के नष्ट हो जाने के कारण सिद्ध पुन: संसार में नहीं आते।

  38. प्रश्न 38. सिद्ध क्या करते हैं?

    सिद्ध अकर्ता हैं। वहां योगजन्य क्रिया है ही नहीं, उपयोगजन्य क्रिया वहां सहज ही होती रहती है। सिद्ध भगवान कृतकार्य हैं। उनके लिए कुछ करना शेष रहा ही नहीं।

  39. प्रश्न 39. सिद्धो के साथ रहने वाले एकेन्द्रिय जीवों को भी क्या मोक्ष सुख की अनुभूति होती है?

    मोक्ष-सुख स्थान विशेष से समुत्पन्न नहीं है। कर्मक्षय से प्राप्त आत्मसुख है। एकेन्द्रिय जीवों को उसकी अनुभूति कैसे हो सकती है। एकेन्द्रिय जीव तो अपने योनिजन्य-कष्ट स्थानों की भांति ही वहां कष्ट भोगते हैं।

  40. प्रश्न 40. सिद्ध की उपासना कैसे हो सकती है?

    ध्यान के दो प्रकार हैं—निरालम्बन ध्यान और सालम्बन ध्यान। जब निरालम्बन अथवा निर्विचार ध्यान की स्थिति बनती है तब सिद्ध की उपासना शुरू होती है। निर्विचार ध्यान का अर्थ है—जहां विचार, जल्प, कल्पना, शब्द सब छूट जाएं, केवल चैतन्य का अनुभव रहे।

  41. प्रश्न 41. निर्विचार ध्यान की स्थिति में जाने के लिए कौनसे प्रयोग किये जा सकते हैं?

    निर्विचार ध्यान की स्थिति प्राप्त करने के लिए दो बातें आवश्यक हैं—स्वरयंत्र की सक्रियता एवं जीभ की चंचलता को समाप्त करना। इनके अभाव में स्मृति और कल्पना से छुटकारा नहीं मिल सकता। स्वरयंत्र को निष्क्रिय बनाने का प्रयोग है—कण्ठ का कायोत्सर्ग। जीभ की चंचलता को समाप्त करने के कई प्रयोग हैं, जैसे— • जीभ को उलट कर तालू की ओर ले जाना। • जीभ को दांतों की जड़ में टिकाना। • जीभ को दांतों के बीच में अधर रखना।

  42. प्रश्न 42. सिद्धों की उपासना के कौन-कौनसे रूप हो सकते हैं?

    सिद्धों की उपासना के तीन रूप निर्दिष्ट हैं— प्रथम—श्वेत निर्मल ज्योति का ललाट पर अर्धचन्द्र के रूप में ध्यान। द्वितीय—दर्शन केन्द्र पर अरुण रंग का ध्यान। अरुण रंग-उगते हुए बाल सूर्य का रंग है। तृतीय—विशुद्धि केन्द्र पर नीले रंग का ध्यान। नीला रंग-समुद्र के समान नीला। प्राचीन मंत्रशस्त्र का अभिमत है कि श्वेत, अरुण और नील- इन तीन रंगों की उपासना करने वाला अनेक समस्याओं से पार पा जाता है। उपरोक्त तीनों रूपों में उपासना करता हुआ साधक निवेदन करता है या आकांक्षा करता है कि मुझे चन्द्र के समान निर्मल, सूर्य के समान तेजस्वी और सागर के समान गंभीर सिद्धि दें।

  43. प्रश्न 43. सिद्धि के लिए कौन-से मंत्र प्रचलित हैं?

    १. सिद्धा। २. ओम्‌ णमो सिद्धम्‌। ३. सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु। ४. णमो सिद्धाणं।

  44. प्रश्न 44. तीसरे पद में आचार्य को नमस्कार किया गया है। आचार्य कौन होते हैं?

    आचार के पांच प्रकार हैं—ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप और वीर्य। इस पंचाचार का जो स्वयं पालन करते हैं एवं दूसरों से पालन करवाते हैं वे आचार्य कहलाते हैं। आचार्य चतुर्विध धर्म के एकमात्र अधिकारी होते हैं। द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव के अनुसार वे धर्मसंघ के विकास के लिए सतत प्रयत्नशील रहते हैं। वे श्रद्धा-धृति-शक्ति-शान्ति सम्पन्न, आठ गणि-सम्पदा से सुशोभित एवं छत्तीस गुणों के धारक होते हैं।

  45. प्रश्न 45. आठ गणि-संपदाएं कौनसी हैं?

    १. आचार संपदा, २. श्रुत संपदा, ३. शरीर संपदा, ४. वचन संपदा, ५. वाचना संपदा, ६. मति संपदा, ७. प्रयोग संपदा, ८. संग्रह परिज्ञा।

  46. प्रश्न 46. आचार्य के ३६ गुण कौन-कौनसे हैं?

    पांच महाव्रत, पांच समिति, चार कषाय वर्जन, तीन गुप्ति, पांच आचार पालन, नव बाड़ सहित ब्रह्मचर्य और पांच इन्द्रिय विजय। वृहत्कल्प भाष्य में आचार्य के छत्तीस गुण निम्न प्रकार से भी मिलते हैं— १. आर्य देश, २. प्रशस्त कुल, ३. प्रशस्त जाति, ४. प्रशस्त रूप, ५. दृढ़ संहनन, ६. धैर्य, ७. अनाशंसी, ८. शलाघा-निरपेक्षता, ९. ऋजुता, १०. स्थिरबुद्धि, ११. आदेय वचन, १२. जितपरिषद्‌, १३. जितनिद्रा, १४. मध्यस्थ, १५. देशकाल-भावज्ञ, १६. प्रत्युत्पन्नमति, १७. अनेक देशभाषाविद्‌, १८. ज्ञान-आचार, १९. दर्शन-आचार, २०. चारित्र-आचार, २१. तप-आचार, २२. वीर्य-आचार, २३. सूत्र-विधिज्ञ, २४. अर्थ-विधिज्ञ, २५. तदुभयविधिज्ञ, २६. उदाहरण निपुण, २७. हेतु निपुण, २८. उपनय निपुण, २९. नय निपुण, ३०. शीघ्रग्राही, ३१. स्व-समयज्ञ, ३२. पर-समयज्ञ, ३३. गंभीर, ३४. अनभिभवनीय, ३५. कल्याणकारी, ३६. शान्तदृष्टि।

  47. प्रश्न 47. क्या आगमों में आचार्य की कसौटियों का उल्लेख हुआ है?

    ठाणं सूत्र में आचार्य के लिए छह कसौटियों का निर्देश किया गया हे— १.श्रद्धाशील होना: अश्रद्धावान्‌ पुरुष मर्यादानिष्ठ नहीं हो सकता। जो स्वयं मर्यादानिष्ठ नहीं होता वह दूसरों को मर्यादा में स्थापित नहीं कर सकता। इसलिए आचार्य बनने की प्रथम योग्यता है—श्रद्धासम्पन्न होना। २.सत्यवादी होना : सत्य के दो अर्थ किए गए हैं—यथार्थ वचन और प्रतिज्ञा के निर्वाह में समर्थ। यथार्थभाषी पुरुष ही यथार्थ का प्रतिपादन कर सकता है। जो की हुई प्रतिज्ञा के निर्वाह में समर्थ होता है, वही दूसरों में विश्वास उत्पन्न कर सकता है। आचार्य दूसरों के लिए विश्वस्त होना चाहिए। इसलिए उसकी दूसरी योग्यता है—सत्यसम्पन्न होना। ३.मेधावी होना : मेधा के दो अर्थ किए गए हैं—मर्यादावान्‌ और शरुतग्रहण करने की शक्ति से सम्पन्न। जो व्यक्ति स्वयं मर्यादावान्‌ है वही दूसरों को मर्यादा में रख सकता है और वही अपने गण में मर्यादाओं का अक्षुण्ण पालन करवा सकता है। जो व्यक्ति तीक्ष्ण बुद्धि सम्पन्न होता है वही श्रुत ग्रहण करने में समर्थ होता है। ऐसा व्यक्ति ही दूसरों से श्रुत ग्रहण कर अपने शिष्यों को उसका अध्यापन कराने में समर्थ हो सकता है। इसलिए उसकी तीसरी योग्यता है—मेधासम्पन्न होना। ४.बहश्रुत होना : जैन परम्परा में बहुश्रुत व्यक्ति का बहुत महत्व रहा है। आचार्य का बहुश्रुत होना बहुत आवश्यक है। जो आचार्य बहुश्रुत नहीं होता वह अपने शिष्यों की ज्ञानसम्पदा कैसे बढ़ा सकता है? अबहुश्रुत की निश्रा में रहनेवाला गण विस्तार नहीं पा सकता। इसलिए उसकी चौथी योग्यता बहुश्रुता है। ५. शक्तिशाली होना : गणनायक को शक्तिसम्पन्न होना चाहिए। उसकी शक्ति सम्पन्नता के चार अवयव हैं— (१) शरीर से स्वस्थ एवं दृढ-संहनन वाला होना। (२) मंत्र के विधि-विधानों का ज्ञाता तथा अनेक मंत्रों की सिद्धियों से सम्पन्न। (३) तन्त्र की सिद्धियों से सम्पन्न। (४) परिवार से सम्पन्न अर्थात्‌ विशिष्ट शिष्य सम्पदा से युक्त। ६. अल्पाधिकरण होना : अधिकरण का अर्थ है—कलह या विग्रह। जो पुरुष स्व-पक्ष या पर-पक्ष के साथ कलह करता रहता है उसका गौरव नहीं बढ़ता। जिसके प्रति गुरुत्व की भावना नहीं होती वह गण को लाभान्वित नहीं कर सकता। इसलिए आचार्य की छठी योग्यता है—कलहरहित होना।

  48. प्रश्न 48. आचार्य किस रंग के प्रतीक हैं?

    पीले रंग के।

  49. प्रश्न 49. 'णमो आयरियाणं' का ध्यान किस केन्द्र पर, किस रंग के साथ किया जाता है?

    विशुद्धि केन्द्र पर पीले रंग के साथ। पीला रंग मन को सक्रिय बनाने वाला है।

  50. प्रश्न 50. चौथे पद में उपाध्याय को नमस्कार किया गया है। उपाध्याय कौन होते हैं?

    जो ज्ञान की स्वयं विशिष्ट साधना करते हैं एवं अन्य की ज्ञानचेतना को जगाने के लिए अहर्निश प्रयत्नशील रहते हैं वे उपाध्याय कहलाते हैं। उपाध्याय श्रुत परम्प: : को सुरक्षित रखते हैं। वे २५ गुणों से युक्त होते हैं।

  51. प्रश्न 51. उाध्याय के २५ गुण कौनसे हैं?

    ग्यारह अंग के ज्ञाता। बारह उपांग के ज्ञाता। आगम अध्ययन में कुशल। आगम अध्यापन में कुशल।

  52. प्रश्न 52. अंग-उपांग किसे कहते हैं?

    गणधरों द्वारा रचित आगम अंग और चतुर्दशपूर्वी या बहुश्रुत आचार्यों द्वारा रचित आगम उपांग कहलाते हैं।

  53. प्रश्न 53. ग्यारह अंग कौन-कोनसे हैं?

    १. आचारांग, २. सूत्रकृतांग, ३. स्थानांग, ४. समवायांग, ५. भगवती, ६. ज्ञाताधर्मकथा, ७. उपासकदशा, ८. अन्तकृतदशा, ९. अनुत्तरोपपातिकदशा, १०. प्रश्नव्याकरण, ११. विपाकश्रुत।

  54. प्रश्न 54. बारह उपांग कौनसे हैं?

    १. औपपातिक, २. राजप्रश्नीय, ३. जीवाजीवाभिगम, ४. प्रज्ञापना, ५. जंबूद्वीपप्रज्ञप्ति, ६. चन्द्रप्रज्ञप्ति, ७. सूर्यप्रज्ञप्ति, ८. निरयावलिका, ९. कल्पवतंसिका, १०. पुष्पिका, ११. पुष्पचूलिका, १२. वृष्णिदशा।

  55. प्रश्न 55. क्या उपाध्याय पद स्वत: लिया जा सकता है?

    उपाध्याय होने के लिए बहुश्रुत (आगमों का ज्ञाता) होना जरूरी है। पर जहां तक उपाध्याय पद का प्रश्न है वह स्वत: नहीं लिया जाता, आचार्य द्वारा निर्णीत होता है।

  56. प्रश्न 56. वर्तमान में हमारे संघ में उपाध्याय कौन हैं?

    प्राचीनकाल में आचार्य और उपाध्याय दो अलग-अलग पद थे। आचार्य भिक्षु ने इस व्यवस्था में परिवर्तन किया। उन्होंने उपाध्याय का पद अलग न रखकर आचार्य में ही समाहित कर दिया। तब से तेरापंथ की आचार्य परम्परा में आचार्य ही उपाध्याय का दायित्व संभालते हैं।

  57. प्रश्न 57. आचार्य व उपाध्याय के उत्कृष्ट कितने भव होते हैं?

    आचार्य और उपाध्याय के उत्कृष्ट पांच भव माने गए हैं। कई उसी भव में मोक्ष चले जाते हैं तो कई दो भव भी कर लेते हैं पर पांचवें भव में तो उनकी मुक्ति निश्चित है।

  58. प्रश्न 58. उपाध्याय किस रंग के प्रतीक हैं?

    हरे रंग के।

  59. प्रश्न 59. 'णमो उवज्झायाणं? का ध्यान किस केन्द्र पर किस रंग के साथ किया जाता है?

    आनन्द केन्द्र पर हरे रंग के साथ। यह रंग कषायों को शान्त करने वाला है।

  60. प्रश्न 60. पांचवें पद में लोक के सब साधुओं को नमस्कार किया गया है। साधु का स्वरूप क्या है?

    जो महाव्रत, समिति, गुप्ति की साधना में सजग रहे। कषायों से दूर रहने का अभ्यास करे। इन्द्रियों एवं मन के वशवर्ती न बने। सुख-दु:ख, निन्दा-प्रशंसा, मान-अपमान में सम रहने का प्रयत्न करे। ज्ञान, दर्शन, चारित्र की सम्यक्‌ आराधना करे, शुद्ध आहार पानी की गवेषणा/खोज करे। कष्ट आने पर अविचलित रहे। वासना से दूर रहे। साध्य/मोक्ष सिद्धि के लिए सतत प्रयत्नशील रहे। शस्त्रीय मर्यादा एवं आचार्य के अनुशासन के प्रति जागरूक रहे—वह सच्चा साधु है।

  61. प्रश्न 61. वर्तमान में सच्चे साधु कौन हैं?

    उपरोक्त प्रश्न के उत्तर में साधु के मानक प्रस्तुत किए गए हैं। उन मानकों के आधार पर व्यक्ति स्वयं निर्णय कर सकता है—कौन साधु है, कौन असाधु। आचार्य भिक्षु के सामने यही प्रश्न उपस्थित किया गया था। उन्होंने एक दृष्टान्त से इसे समझाते हुए कहा—किसी ने पूछा—शहर में साहूकार कौन और दिवालिया कौन? एक समझदार आदमी ने उत्तर दिया—जो ऋण लेकर लौटा देता है वह साहूकार और जो ऋण नहीं लौटाता तथा मांगने पर झगड़ा करता है, वह दिवालिया। इसी प्रकार जो पांच महाव्रतों को स्वीकार कर उनकी सम्यक्‌ अनुपालना करता है वह साधु और जो उनकी सम्यक्‌ पालना नहीं करता वह असाधु है। उत्तराध्ययन सूत्र में पापीश्रमण कौन होता है? इस सम्बन्ध में कहा गया है—जो साधु अधिक निद्रालु होता है, खा-पीकर सुख से सोया रहता है, गुरु की निन्दा करता है, अभिमानवश उनकी सेवा नहीं करता, बड़ों का सम्मान नहीं करता, प्रतिलेखन आदि कार्यों में प्रमाद करता है, बार-बार क्रोध करता है, कलह करता है, खाने का असंयम रखता है—इस प्रकार के दुर्गुण जिसमें होते हैं वह पापीश्रमण कहलाता है।

  62. प्रश्न 62. साधु के कितने भव माने गए हैं?

    साधु के उकृष्ट १५ भव माने गए हैं।

  63. प्रश्न 63. साधु के २७ गुण कौनसे हैं?

    ५महाव्रत—१. अहिंसा, २. सत्य, ३. अचौर्य, ४. ब्रह्मचर्य, ५. अपरिग्रह। ४.कषाय वर्जन—६. क्रोध वर्जन, ७. मान वर्जन, ८. माया वर्जन, ९. लोभ-वर्जन। ५ इन्द्रिय निग्रह—१०. श्रोतरेन्द्रिय निग्रह, ११. चक्षुरिन्द्रिय निग्रह, १२. घ्राणेन्द्रिय निग्रह, १३. रसनेन्द्रिय निग्रह, १४. स्पर्शनेन्द्रिय निग्रह। १५. भावसत्य, १६. करण सत्य १७. योग सत्य, १८. क्षमा, १९. वैराग्य, २०. मनसमाहरणता, २१. वचन समाहरणता, २२. काय समाहरणता, २३. ज्ञान सम्पन्न, २४. दर्शन सम्पन्न, २५. चारित्र सम्पन्न, २६. वेदना में समभाव, २७. मरण में समभाव।

  64. प्रश्न 64. साधु किस रंग के प्रतीक हैं?

    नीले रंग के।

  65. प्रश्न 65. 'णमो लोए सव्वासाहूणं' का ध्यान किस केन्द्र पर किस रंग के साथ किया जाता है?

    नाभि से चार अंगुल नीचे (पेडू के स्थान पर) नीले रंग के साथ। यह रंग शरीर को प्रतिरोधात्मक शक्ति बढ़ाता है।

  66. प्रश्न 66. रंगों का चुनाव किस आधार पर किया गया है? क्या रंगों का शारीरिक स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ता है?

    मंत्रविद् आचार्यों ने मंत्र के गूढ़तम रहस्यों के आधार पर एक-एक पद के लिए एक-एक वर्ण की परिकल्पना की। हमारा शरीर पौद्गलिक है। पुद्गल के चार लक्षण है—वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श। सारा मूर्त संसार वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श के प्रकम्पनों से प्रकम्पित है। वर्ण के साथ हमारे शरीर का बहुत निकट का सम्बन्ध है। वर्ण से हमारे मन का, आवेगों का, कषायों का बहुत बड़ा सम्बन्ध है। शारीरिक स्वास्थ्य और अस्वास्थ्य, मन का स्वास्थ्य और अस्वास्थ्य, आवेगों की कमी और वृद्धि ये सब इस बात पर निर्भर हैं कि हम किस रंग को स्वीकार करते हैं, किससे अलग होते हैं।

  67. प्रश्न 67. ओम्‌ एवं असिआउसा का जप भी किया जाता है। ये क्या हैं?

    ये भी नमस्कार मंत्र के ही संक्षिप्त रूप हैं। पंच परमेष्ठी के आदि अक्षर से दोनों मंत्रों का निर्माण हुआ है। ओम्‌ की निष्पत्ति— अरहंत का आदि अक्षर—अ अशरीरी का आदि अक्षर—अ आचार्य का आदि अक्षर—आ उपाध्याय का आदि अक्षर—उ मुनि का आदि अक्षर—म्‌ संस्कृत व्याकरण के अनुसार अ: + अ + आ + उ + म् की सन्धि करने पर ओम्‌ शब्द निष्पन्न होता है। अ. सि. आ. उ. सा. की निष्पत्ति— अरहंत का आदि अक्षर—अ सिद्ध का आदि अक्षर—सि आचार्य का आदि अक्षर—आ उपाध्याय का आदि अक्षर—उ साधु का आदि अक्षर—सा

  68. प्रश्न 68. नमस्कार मंत्र के प्रत्येक पद के पहले ॐ हीं श्रीं भी लगाया जाता है। इसका क्या तात्पर्य है?

    ॐ हीं श्रीं बीजाक्षर हैं। जैसे बीज में वृक्ष बनने की शक्ति है वैसे ही इन बीजाक्षरों में असीम शक्ति है। मंत्र के साथ इन बीक्राक्षरों का योग होने से मंत्र की शक्ति और अधिक बढ़ जाती है।

  69. प्रश्न 69. माला के मनके १०८ होते हैं। इसका क्या आधार है?

    जैन परम्परा में माला के १०८ मनकों का आधार है पंच परमेष्ठी। पंच परमेष्ठी के गुणों की संख्या १०८ है—अर्हत्‌ के १२, सिद्ध के ८, आचार्य के ३६, उपाध्याय के २५, साधु के २७। इस प्रकार १२+ ८ + ४ + ३६ + २५ + २७ = १०८ गुण होते हैं। इसी आधार पर माला के १०८ मनके होते हैं। इस सम्बन्ध में एक दूसरी मान्यता भी प्राप्त होती है— जैन दर्शन में तीन शब्द आते हैं—संरम्भ, समारम्भ और आरम्भ। संरम्भ अर्थात्‌ हिंसा आदि कार्य करने के लिए उद्यत होना। समारम्भ-साध्य के अनुरूप साधन जुटाना। आरम्भ—जुटाए हुए साधनों का उपयोग करना। संरम्भ, समारम्भ और आरम्भ—इन तीनों प्रवृत्तियों को मन, वचन व शरीर- इन तीन योगों से गुणा करने पर ३X३ = ९। इन ९ प्रवृत्तियों को करना, कराना, अनुमोदन करना। इन तीन करण से गुणा करने पर ९x३ = २७। इन २७ प्रवृत्तियों को क्रोध, मान, माया व लोभ इन चार कषायों से गुणा करने पर २७X४ = १०८। इन १०८ प्रकार की प्रवृत्तियों को त्यागने का संकल्प माला के १०८ मनकों का उद्देश्य है। माला के मनकों की संख्या सभी धर्मों में १०८ ही मानी गई है। वैदिक मान्यता के अनुसार साकार ब्रह्म और निराकार ब्रह्म में सारा विश्व समा जाता है। वहां साकार ब्रह्म बारह आदित्यों के समान है। निर्गुण ब्रह्म नौ के अंक के समान है। बारह और नौ का गुणन करने पर एक सौ आठ की संख्या बनती है। इसे ही माला के १०८ मनकों का आधार माना गया है।

  70. प्रश्न 70. वंदना करने की विधि क्या है?

    खड़े खड़े तीन बार मौन प्रदक्षिणा कर घुटनों के बल बैठकर 'वंदामि नमंसामि सक्कारेमि सम्माणेमि कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं पज्जुवासामि मत्थएण वदामि' पाठ का सस्वर उच्चारण करें। मत्थएण वंदामि उच्चारण के साथ मस्तक झुकाते हुए पंचांग वन्दना करें। पंचांग वन्दना अर्थात्‌ दो हाथ, दो घुटने एवं सिर—ये पांच अंग जमीन का स्पर्श करें। इसके बाद खड़े होकर बद्धाञ्जलि यथास्थान निम्नलिखित शब्दावलि का उच्चारण करें— वन्दे गुरुवरम्‌! हाथ जोड़ अर्ज करूं आपके तनुरत्न में सुखसाता है। वन्दे आचार्यवरम्‌! हाथ जोड़ वन्दे युवाचार्यवरम्‌! हाथ जोड़ वन्दे महाश्रमणीवरम्‌! हांथ जोड़ वन्दे मुनिश्री! हाथ जोड़ वन्दे सांध्वीश्री! हाथ जोड़

  71. प्रश्न 71. प्रदक्षिणा कैसे की जाती है?

    बद्धाञ्जलि दोनों हाथों को नाभि के पास स्थापित करें। फिर दाहिनी ओर से प्रारंभ करके ललाट तक गोलाकार (आरती की पद्धति से) घुमाते हुए पुन: नाभि के पास ले आएं। यह एक बार प्रदक्षिणा हुई। इस प्रकार तीन बार प्रदक्षिणा की जाती है।

  72. प्रश्न 72. धर्मस्थान में प्रवेश करने की क्या कोई विधि है?

    हर क्षेत्र का अपना एक प्रोटोकोल (शिष्टाचार) होता है। जो व्यक्ति उसका पालन करता है वह सभ्य और शिष्ट माना जाता है। धर्म स्थान का भी अपना एक शिष्टाचार है। उसमें कैसे प्रवेश करना चाहिए, कैसी वेशभूषा होनी चाहिए इसका भी अपना महत्व है। भगवती सूत्र में पांच अभिगम बताए गए हैं। पांचों अभिगमों की समन्विति ही धर्मस्थान में प्रवेश करने की विधि है। वे पांच अभिगम इस प्रकार हैं— १. फूल, फल, इलायची आदि सचित्त द्रव्य पास में न रहें। २. आङम्बर या बड़प्पन के सूचक शस्त्र, जूते, चपल आदि न रहें। ३. वेशभूषा सादगीपूर्ण एवं शालीन हो। ४. गुरु जहां से दृष्टिगोचर हों, वहीं पर हाथ जुड़ जाएं। ५. मन गुरुचरणों में ही एकाग्र रहे।

  73. प्रश्न 73. वन्दना किनको की जाती है?

    जो सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र से सम्पन्न हैं, साधना ही जिनका जीवन-धन है, जो समाज का आध्यात्मिक नेतृत्व करते हैं, उन धर्मगुरुओं को वंदना की जाती है।

  74. प्रश्न 74. ज्ञान, दर्शन, चारित्र—तीनों में प्रधानता किसको दी गई है?

    तीनों का अपने-अपने स्थान पर महत्व है। फिर भी तीनों में प्रधानता चारित्र की है। चारित्र के बिना ज्ञान, दर्शन वन्दनीय नहीं होते। सैद्धान्तिक दृष्टि से आठ आत्माओं में एक चारित्र आत्मा को ही वन्दनीय कहा गया है।

  75. प्रश्न 75. वंदना करने से क्या लाभ होता है?

    उत्तराध्ययन सूत्र के अनुसार वन्दना करने से उच्चगोत्रकर्म का बन्ध होता है और नीच गोत्रकर्म का विनाश होता है। ज्ञातासूत्र में तीर्थंकर-गोत्र बन्धन के बीस कारणों का उल्लेख आया है, जिनमें एक है—भावपूर्ण वन्दना करना।

  76. प्रश्न 76. वंदना करने से क्या व्यावहारिक लाभ ही होता है?

    सबसे पहली बात तो यह है कि वन्दना विनम्रता की प्रतीक है। वंदना वही कर सकता है जो अहं-विसर्जन करना जानता है। शरीर विज्ञान की दृष्टि से देखें तो वंदना करने से रीढ़ की हड्डी लचीली होती है। रीढ़ की हड्डी का लचीलापन शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करता है। जब वंदना करने के लिए नीचे झुकते हैं तो एड्रीनल ग्रन्थि (नाभि का स्थान) प्रभावित होती है। उससे सहज ही संवेगों—आवेगों/आवेशों पर नियंत्रण सम्भव है।

  77. प्रश्न 77. मंगल शब्द से क्या तात्पर्य है?

    जिससे विघ्न-बाधाएं दूर हों उसे मंगल कहते हैं।

  78. प्रश्न 78. मंगल के कितने प्रकार हैं?

    मंगल के दो प्रकार हैं—द्रव्य मंगल और भावमंगल। इन्हें लौकिक मंगल और लोकोत्तर मंगल भी कहा जाता है।

  79. प्रश्न 79. द्रव्य मंगल क्या है?

    अक्षत, दूब, फल, फूल, नारियल, रोली, मौली, दही आदि द्रव्य मंगल हैं। लौकिक कार्यसिद्धि के लिए इनका उपयोग किया जाता है। लौकिक देवों की पूजा भी मंगल रूप में प्रचलित है।

  80. प्रश्न 80. भाव मंगल से क्या तात्पर्य है?

    भाव मंगल अर्थात्‌ शुद्ध आध्यात्मिक मंगल।

  81. प्रश्न 81. भाव मंगल कितने हैं?

    चार-अर्हत्‌, सिद्ध, साधु और धर्म।

  82. प्रश्न 82. अर्हत्‌ और सिद्ध को मंगल किस दृष्टि से माना गया है?

    अर्हत्‌ और सिद्ध दोनों शुद्ध चेतना के प्रतीक हैं, इसलिए मंगल हैं।

  83. प्रश्न 83. साधु मंगल किस दृष्टि से हैं?

    साधु चेतना को शुद्ध बनाने की दिशा में प्रयत्नशील है। आत्मा में रहता है, आत्मा में रहने के लिए प्रयत्न करता है, इसलिए मंगल है।

  84. प्रश्न 84. धर्म मंगल किस दृष्टि से है?

    धर्म आत्म-शुद्धि का साधन है, इसलिए मंगल है।

  85. प्रश्न 85. लौकिक मंगल और लोकोत्तर मंगल दोनों का स्वरूप अलग-अलग है फिर लौकिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मंगल पाठ क्यों सुना जाता है?

    मंगल पाठ सुनने/सुनाने का उद्देश्य है—हर स्थिति में व्यक्ति की भावधारा पवित्र बनी रहे। जिस व्यक्ति के मन में देव, गुरु एवं धर्म के प्रति अटूट आस्था होती है वह किसी भी स्थिति में लौकिक देवों की सहायता की कामना नहीं करता। उसके लिए हर स्थिति में चार मंगल ही स्मरणीय हैं। पर सबका मनोबल समान नहीं होता, इसलिए धार्मिक कहे जाने वाले व्यक्ति भी लौकिक देवों की पूजा करते हैं, लौकिक द्रव्यों का उपयोग भी करते हैं।'

  86. प्रश्न 86. क्या लोकिक देवों की पूजा करने से सम्यक्त्व दूषित होता है?

    सम्यक्त्व का सम्बन्ध है सही दृष्टिकोण से। हमारी दृष्टि लौकिक देव और लोकोत्तर देव दोनों के प्रति स्पष्ट रहे लौकिक देवों की पूजा उपासना में धर्म बुद्धि नहीं रहनी चाहिए। प्राचीनकाल में भी कई श्रावक कुल-देवता की पूजा करते थे। पर धर्म समझकर नहीं, कुल का आचार समझकर करते थे।

  87. प्रश्न 87. वीतराग की शरण लेने का क्या तात्पर्य है?

    वस्तुत: वीतराग की शरण ही सही और सच्ची शरण है। जिसकी चेतना रागद्वेष युक्त होती है उसकी शरण खतरे से खाली नहीं होती।

  88. प्रश्न 88. वीतराग की शरण क्यों स्वीकार की जाती है जबकि वे हमारा भला-बुरा कुछ भी नहीं करते?

    वीतराग की शरण का अर्थ किसी व्यक्ति विशेष की शरण नहीं है। अपनी आत्मा की ही शरण है। आत्मा केन्द्र-बिन्दु है। किन्तु परिधि के बिना केन्द्रबिन्दु का मूल्य ही क्या है? परिधि है तभी केन्द्रबिन्दु है और केन्द्रबिन्दु है तब उसकी परिधि भी आवश्यक है। आत्मा की शरण में जाने का अर्थ है—अर्हत्, सिद्ध, साधु और धर्म की शरण ग्रहण करना। जैसे सूर्य किरणों को सूर्य से अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही इस चतुष्टयी को आत्मा से अलग नहीं किया जा सकता। दूसरे में, शरण वही बन सकता है जो स्वयं मंगल होता है और उत्तम होता है। अध्यात्म की भाषा में इस चतुष्टयी को मंगल और उत्तम कहा गया है। इसकी शरण में जाने का तात्पर्य है स्वयं के मंगल एवं उत्तम को साधना।

  89. प्रश्न 89. अर्हत्‌ वंदना का प्रारम्भ कब और कहां हुआ?

    वि. संवत २०२५ (सन्‌ १९६८) मद्रास में हुआ।

  90. प्रश्न 90. अर्हत्‌ की वंदना क्यों करते हैं?

    अर्हत्‌ हमारे आदर्श हैं। उनकी वन्दना करते हुए हम उनके गुणों का स्मरण करते हैं और हम भी अर्हत्‌ बनें, ऐसा संकल्प पुष्ट करते हैं। प्रत्येक आत्मा में अनन्त शक्ति है, अर्हत ने उस शक्ति को जगाया है। हम भी उनकी वन्दना करके शक्ति जागरण की दिशा में प्रयत्नशील बनते हैं।

  91. प्रश्न 91. अर्हत्‌ वंदना का आधार क्या है?

    अर्हत्‌ वन्दना का आधार आगमवाणी है। आगमों के चयनित सूक्तों का इसमें समावेश है।

  92. प्रश्न 92. प्रार्थना के स्थान पर वंदना शब्द का प्रयोग क्यों?

    प्रार्थना शब्द याचना का प्रतीक है। जैनदर्शन में ज्ञान के साथ भक्ति का भी महत्वपूर्ण स्थान है पर भक्ति में याचना का भाव नहीं है। पुरुषार्थ का मूल्य है। जहां याचना का भाव होता है वहां पुरुषार्थ की सत्ता कमजोर हो जाती है।

  93. प्रश्न 93. प्रारम्भिक आगम सूक्तों के बाद जो भक्ति-प्रधान गीत गाया जाता है, क्या उसमें याचना का भाव नहीं है?

    याचना नहीं, उस गीत के माध्यम से आराधक और आराध्य के बीच तादात्म्य स्थापित किया जा सकता है।

  94. प्रश्न 94. अर्हत्‌ वंदना में बैठने की विधि क्या है?

    मन, वाणी और क्रिया की एकात्मकता के साथ वज्रासन की मुद्रा में बैठकर अर्हत्‌ वन्दना की जाती है। इसे वन्दनासन भी कहते हैं।

  95. प्रश्न 95. सामायिक किसे कहते हैं?

    सामायिक श्रावक के बारह व्रतों में नौवां व्रत है। इसे श्रावक की उपासना का एक अनिवार्य अंग माना गया है। सामायिक का सीधा अर्थ है—समता की प्राप्ति। शस्त्रकारों ने सामायिक की अनेक परिभाषाएं की हैं— सामायिक श्रावक के बारह व्रतों में नौवां व्रत है। इसे श्रावक की उपासना का एक अनिवार्य अंग माना गया है। सामायिक का सीधा अर्थ है—समता की प्राप्ति। शस्त्रकारों ने सामायिक की अनेक परिभाषाएं की हैं— • योगशस्त्र के अनुसार आर्त्त और रौद्र ध्यान को छोड़कर समस्त पापकारी प्रवृत्तियों का त्याग कर एक मुहूर्त्त्त के लिए समभाव में स्थित रहना सामायिक है। • आवश्यक—सूत्र में सावद्य योग के त्याग और निरवद्य योग के स्वीकार को सामायिक कहा है। • भगवती—सूत्र के अनुसार आत्मा ही सामायिक है और आत्मा ही सामायिक का अर्थ है। इस प्रकार और भी अनेक परिभाषाएं मिलती हैं पर सबके मूल में समता की साधना ही निहित है।

  96. प्रश्न 96. सावद्ययोग एवं निरवद्ययोग से क्या तात्पर्य है?

    सावद्ययोग अर्थात्‌ पापकारी प्रवृत्तियां। अठारह पाप सावद्ययोग हैं। निरवद्ययोग अर्थात्‌ पापरहित आध्यात्मिक प्रवृत्तियां। अहिंसा आदि जितनी भी आध्यात्मिक प्रवृत्तियां हैं वे सब निरवद्ययोग हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो आत्मा को बंधन की ओर ले जाने वाले कार्य सावद्ययोग हैं और बंधन-मुक्ति की दिशा में ले जाने वाले कार्य निरवद्ययोग हैं। स्वाध्याय, धर्मध्यान, कायोत्सर्ग आत्मचिन्तन आदि प्रवृत्तियां निरवद्ययोग हैं।

  97. प्रश्न 97. अठारह पाप कौनसे हैं?

    १. प्राणातिपात, २. मृषावाद, ३. अदत्तादान, ४. मैथुन, ५. परिग्रह, ६. क्रोध, ७. मान, ८. माया, ९. लोभ, १० राग, ११ द्वेष, १२. कलह, १३. अभ्याख्यान, १४. पैशुन्य, १५. पर-परिवाद, १९. रति-अरति, १७. माया-मृषा, १८. मिथ्यादर्शन शल्य।

  98. प्रश्न 98. अठारह पापों से बचने के लिए सामायिक में क्या करना चाहिए?

    सबसे पहले सामायिक के अर्थ को स्मृति में रखते हुए अपने सामने एक स्पष्ट चित्र रखना चाहिए कि मैं सामायिक की साधना में उपस्थित हूं। मुझे हर क्षण समता में बिताना है। विधायक चिन्तन में बिताना है। उसके बाद अपनी रुचि के अनुसार अठारह पाप में से किसी एक को आलम्बन बनाएं जिसकी साधना आपको विशेष रूप से करनी है। जैसे आपको क्रोध अधिक सताता है तो आप निम्नोक्त शब्दावलि का सहारा लें—मेरा क्रोध शांत हो रहा है। इस शब्दावलि का आंखें बन्द कर नौ बार कोमलता से उच्चारण करें फिर मानसिक धरातल पर उसका चिन्तन करें। इससे धीरे-धीरे आपको अपने लक्ष्य में सफलता मिल सकती है।

  99. प्रश्न 99. सामायिक का कालमान कितना है?

    सामायिक का कालमान एक मुहूर्त्त अर्थात्‌ दो घड़ी या अड़तालीस मिनट का है।

  100. प्रश्न 100. सामायिक का कालमान एक मुहूर्त्त का ही क्यों? क्या किसी आगम में इसका उल्लेख मिलता है?

    किसी आगम में इसका स्पष्ट संकेत नहीं है। यह प्राचीन आचार्यो दारा सम्मत परंपरा है। जिस किसी उपासना विधि का कालमान आगमों में निर्दिष्ट नहीं है उसका कालमान आचार्यों ने एक मुहूर्त्त यानी ४८ मिनट का माना है। जैसे नवकारसी के लिए किसी कालमान का निर्देश न होने से उसका काल सूर्योदय से एक मुहूर्त्त का माना है। वैसे ही सामायिक पाठ में काल का निर्देश न होने से एक मुहूर्त्त का ही माना गया है।

  101. प्रश्न 101. सामायिक का अधिकारी कौन हो सकता है?

    सिद्धान्त की भाषा में पंचम गुणस्थानवर्ती श्रावक सामायिक का अधिकारी हो सकता है। व्यावहारिक दृष्टि से विचार किया जाए तो जो व्यक्ति समता का उपासक है, समता की साधना में विश्वास रखता है, समता का विकास करना चाहता है, वह सामायिक का अधिकारी है।

  102. प्रश्न 102. श्रावक की सामायिक कितने करण-योग से की जाती है?

    २ करण ३ योग से की जाती है।

  103. प्रश्न 103. करंण और योग से क्या तात्पर्य है?

    करण अर्थात प्रयत्न विशेष। योग अर्थात्‌ प्रवृत्ति। करण तीन हैं—करना, कराना, अनुमोदन करना। योग तीन हैं—मन, वचन, काया।

  104. प्रश्न 104. छह कोटि, आठ कोटि, नौ कोटि सामायिक से क्या तात्पर्य है?

    छह कोटि सामायिक—दो करण तीन योग— करना नहीं—मनसे करना नहीं—वचन से करना नहीं—काया से आठ कोटि सामायिक—दो करण तीन योग एवं वाचिक, कायिक अनुमीदन। नौ कोटि सामायिक—तीन करण, तीन योग से।

  105. प्रश्न 105. श्रावक के दारा सामायिक कितनी कोटि से की जाती है?

    प्रचलित विधि के अनुसार श्रावक के द्वारा छह कोटि से सामायिक स्वीकार की जाती है और आठ कोटि से उसका पालन होता है। मन की गहरी एकाग्रता की स्थिति में नौ कोटि से पालन संभव है।

  106. प्रश्न 106. सामायिक के द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव समझाएं?

    द्रव्य—समता रूप सामायिक क्षेत्र-सभी क्षेत्र काल—एक मुहूर्त्त भाव—राग द्वेष मुक्त चेतना व्यावहारिक दृष्टि से निरतिचारं सामायिक के लिए सामायिक के उपयोग में आने वाले द्रव्य-उपकरण एवं क्षेत्र, काल व भाव की शुद्धि पर भी ध्यान देना आवश्यक है। द्रव्य शुद्धि सामायिक के समय उपयोग में आने वाले उपकरण व्यवहार की दृष्टि से द्रव्य कहलाते हैं। ये द्रव्य हैं—माला, वस्त्र, मुखपत्ति, आसन आदि। ये स्वच्छ एवं सादगी युक्त रहने चाहिए। क्षेत्र शुद्धि सामायिक सभी क्षेत्रों में हो सकती है। उसके लिए कोई निश्चित क्षेत्र नहीं है। पर मानसिक स्वस्थता के लिए एकान्त, शुद्ध एवं निर्विकार स्थान को अपेक्षा है। रसोई घर के पास, बच्चों के कोलाहल के बीच अथवा टी. वी. चल रहा हो ऐसे स्थान में बैठकर सामायिक करने से मन अधिक चंचल बन सकता है। सामायिक के लिए जहां तक हो सके प्रतिदिन का स्थान नियत रहना चाहिए। जिस स्थान पर बैठकर प्रतिदिन सामायिक की जाती है उस स्थान का वातावरण भी बहुत पवित्र बन जाता है। उस स्थान में प्रवेश करते ही व्यक्ति के मन में सामायिक उतर आती है। स्थान की शुद्धि मन, वचन व शरीर तीनों को प्रभावित करती है। काल शुद्धि सामायिक के लिए समय कोई नियत नहीं है फिर भी निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है— • अपनी सुविधानुसार ऐसे समय का चयन हो जब आप एकाग्र रह सके। • समय जहां तक हो प्रतिदिन एक ही रखना चाहिये। इससे विचार, भाव स्थिर रहते हैं। • सर्वोकृष्ट समय ब्रह्म मुहूर्त्त माना गया है।