सम्यक्त्व पृच्छा
प्रश्न 1. सम्यक्त्व किसे कहते हैं?
सम्यक्त्व का अर्थ है—सत्य का यथार्थबोध। जीव-अजीव आदि तत्त्वों को सही समझना। देव, गुरु तथा धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा होना।
प्रश्न 2. सम्यक्त्व कैसे प्राप्त होता है?
सम्यक्त्व प्राप्त होता है दर्शनमोहनीय कर्म की तीन प्रकृतियों एवं चारित्र मोहनीय कर्म की चार प्रकृतियों-अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ—इन सात प्रकृतियों के विलय से।
प्रश्न 3. सम्यक्त्व प्राप्ति के हेतु क्या हैं?
सम्यक्त्व प्राप्ति के दो हेतु हैं—निसर्ग और अधिगम।
प्रश्न 4. निसर्ग सम्यक्त्व से क्या तात्पर्य है?
निसर्ग अर्थात् स्वभाव। किसी-किसी जीव का बिना किसी प्रयत्न के नैसर्गिक रूप से मिथ्यात्व क्षीण हो जाता है। जैसे पहाड़ी नदी में लुढ़कता हुआ प्रस्तर खण्ड घिसकर गोल और चिकना हो जाता है वैसे ही अनादि काल से आत्मा के साथ चिपके हुए मिथ्यात्व के कर्म स्वत: ही काल परिपाक से दूर हो जाते हैं और जीव को सम्यक्त्व प्राप्त हो जाता है। यह निसर्ग सम्यक्त्व है।
प्रश्न 5. अधिगम सम्यक्त्व से क्या तात्पर्य है?
गुरु के उपदेश अथवा अन्य किसी बाह्य निमित्त से मिलने वाला सम्यक्त्व अधिगम सम्यक्त्व है।
प्रश्न 6. सम्यक्त्व प्राप्ति का फल क्या है?
सम्यक्त्व एक प्रकार से मोक्ष गमन का आरक्षण पत्र है। शस्त्रों में कहा गया है—प्राणी को किसी भी जन्म में एक बार भी सम्यक्त्व का स्पर्श हो जाता है, तो उसका कुछ कम अर्धपुद्गल परावर्तन की समयावधि में मुक्त होना निश्चित है। जब तक वह मुक्त नहीं होता है और सम्यक्त्व के रूप में संसार में रहता है, तब तक उत्तम गतियों और कुलों में जन्म लेता है।
प्रश्न 7. सम्यक्त्वी कौन है और मिथ्यात्वी कौन है? इसका पता कैसे चल सकता है?
निश्चय नय की दृष्टि से विचार किया जाए तो विशिष्ट ज्ञानी को छोड़कर कोई भी व्यक्ति अपने या दूसरे के सम्यक्त्व का साक्षी नहीं बन सकता, पर व्यवहार नय की अपेक्षा उसकी पहचान के पांच बिन्दु बताए गये हैं जिन्हें सम्यक्त्व के लक्षण कहा जाता है। वे इस प्रकार हैं— शम—क्रोध आदि कषायों का उपशमन संवेग—मोक्ष की अभिलाषा। निर्वेद—संसार से विरक्ति। अनुकम्पा—प्राणीमात्र के प्रति दयाभाव। आस्तिक्य—आत्मा, कर्म, कर्मफल आदि में विश्वास।
प्रश्न 8. सम्यक्त्व आने के बाद स्थायी रह सकता है या जा भी सकता है?
सम्यक्त्व के पांच प्रकार हैं—औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, सास्वादन और वेदक। इनमें क्षायिक सम्यक्त्व आने के बाद पुन: नहीं जाता। शेष सम्यक्त्व आती हैं, चली जाती हैं।
प्रश्न 9. सम्यक्त्व विनाश के हेतु क्या हैं?
सम्यक्त्व विनाश के ३ हेतु बताए गए हैं— १. आगमों में अनास्था। २. साधुत्व में अनास्था। ३. पृथ्वीकाय आदि छह जीवनिकाय में अनास्था।
प्रश्न 10. सम्यक्त्व को सुरक्षित कैसे रखा जा सकता है?
सम्यक्त्व को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है सम्यक्त्व को दूषित करने वाले तत्त्वों से बचा जाए। वे तत्त्व पांच माने गए हैं— शंका—तत्त्व के प्रति या लक्ष्य के प्रति सन्देह होना। कांक्षा—लक्ष्य से विपरीत दृष्टिकोण के प्रति अनुराग। विचिकित्सा—लक्ष्य पूर्ति के साधनों के प्रति संशयशीलता। परपाषंड प्रशंसा—लक्ष्य के प्रतिकूल चलने वाले पुरुष या लक्ष्य से प्रतिकूल ले जाने वाले सिद्धान्त की प्रशंसा करना परपाषंड परिचय—लक्ष्य के प्रतिकूल चलने वाले पुरुष या लक्ष्य के प्रतिकूल ले जाने वाले सिद्धान्त का परिचय-सम्पक करना। आज की भाषा में सम्यक्त्व के इन दूषणों को प्रदूषण की संज्ञा दी जा सकती है। जिस प्रकार हवा, पानी आदि का प्रदूषण मानव जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है उसी प्रकार शंका, कांक्षा आदि दूषण आत्मा के विशिष्ट गुण सम्यक्त्व को दूषित करते हैं।
प्रश्न 11. सम्यक्त्व के आचार कितने हैं?
सम्यक्त्व के आठ आचार हैं— १. नि:शंकित वीतराग वचनों पर दृढ़आस्था रखना। २. निष्कांक्षित—कुमत की वांछा न करना। ३.निर्विचिकित्सित—धर्म के फल में संशय न करना। ४.अमूढ़दृष्टि—परदर्शन की समृद्धि देखकर नहीं फंसना। ५.उपबृंहण—साधर्मिक का गुणोत्कीर्तन करना। ६.स्थिरीकरण—धर्म या न्याय मार्ग से विचलित व्यक्ति को पुन: धर्म और न्याय मार्ग में स्थिर करना। वात्सल्य—गुरु, तपस्वी, शैक्ष, ग्लान आदि की विशेष सेवा करना। प्रभावना—वीतराग शासन की महिमा बढ़ाना।
प्रश्न 12. सम्यक्त्व प्राप्ति के बाद जीव संसार में कब तक परिभ्रमण कर सकता है?
सम्यक्त्व प्राप्ति के पश्चात् जीव उसी भव में मुक्त हो सकता है। अधिकतम कुछ कम अर्धपुद्गल परावर्तन तक परिभ्रमण कर सकता है। क्षायिक सम्यक्त्व जिसे प्राप्त हो गई वह तीसरे भव में तो अवश्य मोक्षगामी होता है।
प्रश्न 13. क्या सम्यक्त्वी के अकाम निर्जरा होती है?
सम्यक्त्वी के सकाम निर्जरा होती है। परवशता या स्थिति विशेष में अकाम निर्जरा भी हो सकती है।
प्रश्न 14. सम्यक्त्वी मर कर कहां जाता है?
सम्यक्त्वी दो प्रकार के होते हैं—औदारिक शरीरी व वैक्रिय शरीरी। औदारिक शरीरी अर्थात् मनुष्य और तिर्यंच। सम्यक्त्व अवस्था में यदि ये आयुष्य का बंधन करते हैं तो निश्चित ही देवगति में और उसमें भी केवल वैमानिक देवलोक में ही जाते हैं वैक्रिय शरीरी अर्थात् नारक और देव। सम्यक्त्व अवस्था में ये केवल मनुष्य जाति का ही आयुष्य बांधते हैं। सम्यक्त्व प्राप्ति से पूर्व यदि आयुष्य का बंध हो तो औदारिक शरीरी चारों गतियों में जा सकते हैं। वैक्रिय शरीरी केवल मनुष्य और तिर्यंच गति में जाते हैं।
प्रश्न 15. मिथ्यात्वी कौन होता है?
जीव, अजीव आदि तत्त्वों के प्रति जिसका दृष्टिकोण विपरीत होता है वह मिथ्यात्वी होता है।
प्रश्न 16. मिथ्यात्वी के सकाम निर्जरा होती है अथवा अकाम?
दोनों निर्जरा हो सकती है।
प्रश्न 17. मिथ्यात्वी व सम्यक्त्वी की तपस्या में क्या अन्तर है?
मिथ्यात्वी व सम्यक्त्वी की तपस्या की निष्पत्ति में बहुत बड़ा अन्तर रहता है। मिथ्यात्वी के निर्जरा सम्यक्त्वी की अपेक्षा बहुत कम होती है। मिथ्यात्वी अवस्था में तामली तापस ने साठ हजार वर्ष तक बेले-बेले तप किया। कहा जाता है उतना तप यदि सम्यक्त्व अवस्था में किया जाए तो सात जीव मोक्षगामी हो जाए।