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जैन धर्म परिचय

जैन धर्म के विकास के हेतु

1.मध्यम मार्ग—जैन आचार्यों ने गृहस्थ के लिए अणुव्रतों का विधान कर उनकी सामयिक अपेक्षाओं का द्वार बन्द नहीं किया ।

2.समन्वय—जैन धर्म में भिन्‍न—भिन्‍न विचारों का सापेक्ष दॄष्‍टि से समन्वय होने के कारण यह विभिन्‍न विचारधारा के लोगों को अपनी ओर आकृष्‍ट कर सका ।

3.समाहा—जैन धर्म ने जातिवाद की तात्त्विकता मान्य नहीं की, इसलिए सभी जाति के लोग उसे अपनाते रहे ।

4.परिवर्तन की क्षमता—जैन समाज में देश और काल के अनुसार परिवर्तन का अवकाश रहा ।

5.सैद्धान्तिक सहिष्णुता—दूसरे धर्मों के सिद्धान्तों को सहने की क्षमता ।

6.भाषा—जन—भाषा का प्रयोग ।

7.अहिंसा—अहिंसा का व्यवहार में प्रयोग ।

8.प्रामाणिकता—गृहस्थ अहिंसा—पालन के साथ—साथ देश के विकास और रक्षा के लिए अपने कर्तव्य के प्रति बहुत जागरूक रहे हैं ।

9.नेतृत्व—सशक्त और कुशल आचार्यों का नेतृत्व ।