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जैन धर्म परिचय

जैन जीवन शैली के नौ तत्त्व

1.समानता एवं सम्यक् दर्शन

सम्यक् दर्शन के फलित हैं—

सम्यक् दॄष्‍टिकोण का विकास ।

विधायक दॄष्‍टिकोण का विकास ।

तीव्रतम क्रोध, मान, माया और लोभ का उपशमन ।

2.अनेकान्त

अनेकान्त की शैली को जीने के फलित हैं

सापेक्ष दॄष्‍टिकोण का विकास ।

समन्वय की मनोवृत्ति का विकास ।

विवादास्पद प्रसंग में सामंजस्य स्थापित करने वाली मनोवृत्ति का विकास ।

अनाग्रह और विनम्रतापूर्वक मनोवृत्ति का विकास ।

3. अहिंसा

अहिंसा की जीवन—शैली के फलित हैं—

संवेदनशीलता का विकास ।

पर्यावरण के प्रदूषण की रोकथाम ।।

प्राणीमात्र के प्रति मैत्री का क्रमिक विकास ।

4.समण संस्कृति, शान्त वृत्ति एवं श्रम

समण संस्कृति की जीवन शैली के फलित हैं—

मानवीय एकता ।

जातीय घृणा और छुआछूत की समाप्ति

शान्तिपूर्ण सह—अस्तित्व ।

संतुलित व्यवहार ।

स्वावलम्बन का विकास ।

5.इच्छा—परिमाण और मनोनुशासनम्

इस प्रक्रिया के छह अंग हैं—

आहार का अनुशासन ।

शरीर का अनुशासन ।

इन्द्रिय का अनुशासन ।

श्‍वास का अनुशासन ।

इच्छा का अनुशासन ।

मन का अनुशासन ।

6.सम्यक् आजीविका

सम्यक् आजीविका के फलित हैं—

व्यवसाय—शुद्धि, प्रामाणिकता ।

शराब आदि मादक तथा मांस, मत्स्य, अण्डा आदि अभक्ष्य पदार्थों के व्यापार का वर्जन ।

तस्करी का वर्जन ।

खाद्य पदार्थों में मिलावट का वर्जन ।

शस्त्र के व्यवसाय का वर्जन ।

जंगलों की कटाई का वर्जन ।

7. सम्यक् संस्कार एवं समता की उपासना

सम्यक् संस्कार की जीवन—शैली के फलित हैं—

अभिवादन, पत्र—व्यवहार आदि में जय जिनेन्द्र का प्रयोग ।

गृहसज्जा आदि में जैन संस्कृति—सूचक चिह्न, वाक्य आदि को प्राथमिकता ।

8.आहार—शुद्धि और व्यसन—मुक्ति

आहार—शुद्धि और व्यसन—मुक्ति के फलित हैं—

स्वस्थ और संतुलित जीवन ।

शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य में वृद्धि ।

अपराधी मनोवृत्ति से बचाव ।

9.साधर्मिक वात्सल्य

साधर्मिक वात्सल्य की जीवन शैली के फलित हैं—

जन—जन में अहिंसा के प्रति आकर्षण ।

जातीय सद्भाव ।

साम्प्रदायिक सद्भाव ।