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जैन धर्म परिचय

क्षमा (खमत-खामणा)

क्षमा का अर्थ है—सहना ।

सहने को अपना धर्म मानकर विरोधी भाव को सहना क्षमा है ।

सहना पड़े वह सामर्थ्य हीनता है ।

क्षमा शक्तिशाली का अस्त्र है ।

अपनी शक्ति के उन्माद पर नियन्त्रण रखना क्षमा है । जो दूसरों को क्षमा देना नहीं जानता वह ‘तुच्छ है । दूसरों से क्षमा लेना नहीं जानता, वह उद्दण्ड है । शान्ति उसे मिलती है जिसके हृदय में क्षमा लहराये । दूसरों की कमजोरियों, अपराधों और भूलों को भुला सके, वही आनन्द का स्रोत बन सकता है । अपने अपराधों के लिए क्षमा मांगने में जो न सकुचाये, वह महान है । शान्ति दूत वही है, जो अपनी भूलों से उत्पन्‍न वेदना को भुला देने का नम्र अनुरोध करे ।

क्षमा वही व्यक्ति कर सकता है, जिसका हृदय विशाल हो, जिसमें सहज सरलता हो और जीवन को अभिभूत करने वाली मृदुता हो ।

जो क्षमा करना नहीं जानता, वह न निज पर शासन कर सकता है न अन्य व्यक्तियों पर ।

शब्दोच्चारण के साथ मन में जमा हुआ शत्रुता का भाव समाप्त हो जाना ही क्षमायाचना है ।

क्षमाशील वह होता है, जो अतीत को विस्मृत करता है, वर्तमान की चिन्तनधारा बदलता है और भविष्य में किसी प्रकार की छलना न करने का संकल्प करता है ।

—आचार्य तुलसी